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अमरमणि त्रिपाठी ने बनवा रखे हथियारों के फर्जी लाइसेंस, काट रहे हैं उम्रकैद की सजा

Wed, 14 Mar 2018 08:07 PM IST
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, कानपुर
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अमरमणि त्रिपाठी
फर्जी पते पर बने पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी के असलहा लाइसेंस 30 साल बाद भी निरस्त नहीं हो सके हैं। गोरखपुर निवासी अमरमणि त्रिपाठी ने कानपुर के फर्जी पते पर लाइसेंस बनवाए थे। हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व मंत्री के नाम रिवाल्वर और बंदूक के लाइसेंस हैं। अमरमणि त्रिपाठी निवासी 19 ए हुमायूंबाग गोरखपुर का रिवाल्वर लाइसेंस (संख्या 85) 15 मार्च 1984 को और दोनाली बंदूक का लाइसेंस (नंबर 78) दो नवंबर 1983 को कानपुर से जारी हुआ था। इस लाइसेंस पर 128/51 सी ब्लॉक किदवई नगर का पता दर्ज है। शिकायत पर जांच हुई। 15 दिसंबर 1986 को तत्कालीन किदवई नगर चौकी प्रभारी डूमर सिंह ने रिपोर्ट लगाई कि दिए गए पते पर अमरमणि त्रिपाठी न रहते हैं और न कभी रहे हैं।
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अमरमणि त्रिपाठी
इस जांच रिपोर्ट के बाद एडीएम कोर्ट ने 1986 में लाइसेंस निरस्त कर अमरमणि को बंदूक जमा कराने का आदेश दिया। रिवाल्वर लाइसेंस निरस्त करने के लिए जिलाधिकारी की कोर्ट में मुकदमा चला। 13 मई 1998 को तत्कालीन जिलाधिकारी बीएल भुल्लर की कोर्ट ने लाइसेंस निरस्त कर दिया। तब अमरमणि ने मंडलायुक्त की कोर्ट में अपील की और दलील दी कि वह ठेकेदारी करते हैं, राजनीति से भी जुड़े हैं। कानपुर आना-जाना रहता है।
 
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अमरमणि त्रिपाठी
तत्कालीन आयुक्त विजय शंकर ने 10 नवंबर 1998 को आदेश दिया कि गोरखपुर जिलाधिकारी से अमरमणि के बारे में रिपोर्ट मंगाई जाए। इसमें उनकी स्थिति, निवास, वहां कोई मुकदमा हो तो उसकी भी जानकारी दी जाए। उस रिपोर्ट के बाद असलहा लाइसेंस निरस्त किए जाएं। तब से आज तक कानपुर के जितने भी जिलाधिकारी रहे, सभी गोरखपुर जिलाधिकारी को पत्र लिखते रहे। रिपोर्ट न आने के कारण अभी भी असलहा लाइसेंस निरस्त नहीं हो सके हैं। वर्ष 2000 से 2017 तक की अवधि में जितने भी डीएम रहे सभी ने इस संबंध में रिपोर्ट मांगी। आठ डीएम के लेटर और रिमाइंडर फाइल में संलग्न हैं।
 

अभी भी पते पर सत्यापन को पहुंचती पुलिस

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अमरमणि त्रिपाठी
अंधेरगर्दी की हालत यह है कि लाइसेंस का सत्यापन करने किदवई नगर पुलिस अभी भी 128/51 सी ब्लॉक किदवई नगर पहुंचती है। यह मकान सेवानिवृत्त बंदोबस्त अधिकारी बाबूराम की पत्नी के नाम है। बाबूराम का निधन हो चुका है। उनके बेटे अशोक सिंह ठेकेदारी करते हैं। अशोक सिंह बताते हैं कि फर्जी पते पर असलहा लाइसेंस बनने का खुलासा 1986 में होने के बाद तत्कालीन किदवई नगर थानाध्यक्ष और चौकी प्रभारी निलंबित हुए थे। उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हुआ था। अमरमणि त्रिपाठी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ था। 
 
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मधुमिता मर्डर में हुई है सजा

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अमरमणि त्रिपाठी
9 मई 2003 को लखनऊ में कवियित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में अमरमणि त्रिपाठी का नाम आने पर मायावती सरकार ने अपने इस मंत्री को बर्खास्त कर दिया था। अमरमणि को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
 
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अधिकारियों के बयान

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डेमाे पिक
गोरखपुर जिलाधिकारी से अमरमणि त्रिपाठी के मुकदमों की लिखित रिपोर्ट न आने से मुकदमा लंबित चल रहा है। लाइसेंस और उनके मुकदमों के बारे में रिपोर्ट मांगी गई है। 
- सुरेंद्र सिंह, जिलाधिकारी-कानपुर
अमरमणि के शस्त्र लाइसेंस के बारे में कानपुर प्रशासन की तरफ से जानकारी मांगे जाने का पत्र मेरे संज्ञान में नहीं है। आयुध प्रभारी से पता किया जाएगा। पूर्व में आई किसी चिट्ठी का जवाब अगर पेंडिंग है तो नियमानुसार उस पर कार्रवाई की जाएगी।
- राजीव रौतेला, डीएम, गोरखपुर
 
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फिर भी फर्जी पते से असलहा बन गया

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अमरमणि त्रिपाठी
असलहा लाइसेंस बनवाने के लिए कई तरह की जांच होती हैं। आम आदमी को यह जांच पूरी कराने में कई तरह की परेशानी आती है। असलहा आवेदन के बाद चौकी प्रभारी, थानाध्यक्ष, पूरे जिलों के थाने से जांच, सीओ की रिपोर्ट, एसपी की रिपोर्ट और फिर एसएसपी की रिपोर्ट लगती है। एलआईयू जांच भी कराई जाती है। इसी तरह तहसील से लेखपाल, कानूनगो, तहसीलदार, एसडीएम की जांच रिपोर्ट लगती है। इसके बाद जिलाधिकारी लाइसेंस जारी करते हैं।
 
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एक्सपर्ट कमेंटः सिस्टम की पोल खोलता है मामला

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अमरमणि त्रिपाठी
अधिवक्ता शिवाकांत दीक्षित का कहना है कि इतने संवेदनशील मामले पर तो स्पेशल मैसेंजर भिजवाकर रिपोर्ट मंगवाई जा सकती थी। आखिर 18 साल से प्रशासन इतने संवेदनशील मामले पर ढुलमुल रवैया कैसे अपना रहा है।
छह माह के अंदर होता फैसला
बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सुरेश सिंह का कहना है कि शस्त्र लाइसेंस निलंबन और निरस्तीकरण के मुकदमें अमूमन तीन से छह माह के अंदर निपट जाते हैं। शस्त्र लाइसेंसधारक को नोटिस जाती है और जवाब मिलने के बाद सुनवाई करते हुए कोर्ट फैसला सुना देती है। 
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