कानपुर। जयपुर के आईसीयू में लगी आग जैसी घटना अगर हैलट में हुई तो बड़ी आफत आ सकती है। यहां फायर सेफ्टी सिस्टम लगा रही कार्यदायी संस्था राजकीय निर्माण निगम चार साल से काम पूरा नहीं कर पाई है। इमरजेंसी में फायर िस्प्रंकलर भी नहीं लगे हैं। अग्निशमन यंत्रों के बलबूते बड़ी आग पर काबू नहीं पाया जा सकता। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि वह डेढ़ दर्जन से अधिक पत्र संस्था के जिम्मेदारों को भेज चुके हैं।
हैलट और संबद्ध अस्पतालों में जगह-जगह अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं। आए दिन शॉर्ट सर्किट जैसी घटनाएं होती हैं तो इनका इस्तेमाल कर लिया जाता है। इमरजेंसी और अस्पताल के स्टाफ को हर छह महीने में प्रशिक्षण भी दिया जाता है लेकिन यहां पर बड़ी आग के लिए फायर सेफ्टी सिस्टम नहीं है। सिस्टम लगाने के लिए निर्माण निगम को सात करोड़ रुपये का कार्य दिया गया है। हैलट की इमरजेंसी में रोगियों का लोड अधिक रहता है।
इसके अलावा हैलट के आईसीयू के बेड फुल रहते हैं। हाल में वेंटिलेटर में शॉर्ट सर्किट से आग लग चुकी है। प्राचार्य डॉ. काला ने बताया कि जल्दी ही इमरजेंसी में फायर िस्प्रंकलर की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही कार्यदायी संस्था से कहा जाएगा कि पाइप लगाने का काम जल्दी से पूरा करे। वैसे स्टाफ प्रशिक्षित है। कुछ होने पर तुरंत अग्निशमन यंत्रों से काबू पा लिया जाएगा।
आग का खतरा निजी अस्पतालों में अधिक
- गली-कूंचों के कमरों और घनी आबादी में चल रहे निजी अस्पतालों में आग लगने पर सबसे अधिक खतरा है। शासन ने हर अस्पताल के पंजीकरण के लिए अग्नि विभाग का अनापत्ति प्रमाणपत्र अनिवार्य किया है। इसके अलावा बहुत से अस्पताल बिना पंजीकरण के और मानक पूरे किए बिना ही चल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग इनके आगे लाचार है। स्वास्थ्य विभाग में अभी तक 380 निजी अस्पतालों का पंजीकरण हुआ है लेकिन विभागीय आकलन के मुताबिक नौ सौ से एक हजार तक छोटे-बड़े अस्पताल हैं। एसीएमओ नर्सिंगहोम डॉ. रमित रस्तोगी का कहना है कि कितने अस्पताल पंजीकृत हैं, उन्हें पता नहीं है। इसके लिए पोर्टल देखना पड़ेगा। सीएमओ डॉ.हरिदत्त नेमी का कहना है कि नर्सिंगहोमों की जांच कराई जाएगी।