नियुक्ति के पहले से ही प्रताड़ना शुरू कर दी थी
डॉ. सडरेला ने आरोप लगाया है कि नियुक्ति से पहले और बाद में उनके खिलाफ चारों प्रोफेसरों ने साजिश रची। गलत तरीके से उन्हें अयोग्य ठहराने के लिए प्रोफेसरों के बीच बैठकें कीं और आपत्तिजनक बातें भी कहीं। डॉ. सडरेला ने कहा कि जब उन्होंने इसकी शिकायत की तो मामला साफ हो गया। दो अलग-अलग जांच कमेटी ने चारों प्रोफेसरों को दोषी ठहराया। नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल कास्ट (एनसीएससी) ने भी चारों पर कार्रवाई के लिए निदेशक और विभागाध्यक्ष को कई बार निर्देश जारी किया।
बीओजी से पहले ई-मेल ने मचाया था हड़कंप
एफआईआर में डॉ. सडरेला का आरोप है कि 17 अक्तूबर को इंस्टीट्यूट के बोर्ड ऑफ गवर्नेंस (बीओजी) की बैठक थी। इसमें चारों प्रोफेसरों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित होनी थी, लेकिन चारों प्रोफेसरों ने मिलकर 15 अक्तूबर को एक फेक ई-मेल अकाउंट के जरिए निदेशक सहित सभी प्रोफेसरों को ई-मेल किया। इसमें मुझे (डॉ. सडरेला) बदनाम करने के लिए आरोप लगाया गया कि मेरी पीएचडी की थिसीस चोरी की हुई है। ई-मेल जारी करने वाले के खिलाफ भी डॉ. सडरेला ने अज्ञात में एफआईआर दर्ज कराई है।
प्रो. देबोपम दास और प्रो. एमएलएन राव पर भी लगे आरोप
अभी तक प्रो. राजीव शेखर, प्रो. संजय मित्तल, प्रो. सीएस उपाध्याय और प्रो. ईशान शर्मा पर दलित उत्पीड़न का आरोप लगा था लेकिन डॉ. सडरेला ने बीओजी के सदस्य प्रो. देबोपम दास और प्रो. एमएलएन राव पर भी एफआईआर में गंभीर आरोप लगा दिए हैं। डॉ. सडरेला का आरोप है कि इन्हीं दोनों प्रोफेसरों के दबाव के चलते बोर्ड ने चारों प्रोफेसरों को सर्विस रूल्स के उल्लंघन का दोषी तो माना लेकिन एससी-एसटी मामले से बरी कर दिया। प्रो. देबोपम पर डॉ. सडरेला ने मानसिक तौर पर उत्पीड़न करने का भी आरोप लगाया है। हालांकि मामले में पुलिस ने इन दोनों के खिलाफ एफआईआर नहीं दर्ज की है।