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संघर्ष के बाद हुई प्राथमिकी, सजा के लिए कोर्ट में करूंगा पैरवी : देवी प्रसाद

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कानपुर। गांधीग्राम निवासी कांग्रेसी नेता देवी प्रसाद पाठक के छोटे भाई, मामा, दो कर्मियों सहित अन्य को 35 साल पहले फर्जी मुठभेड़ में फंसाकर जेल भेजने के आरोपी तत्कालीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब प्राथमिकी हुई है। मामले की पैरवी कर रहे देवी प्रसाद ने बताया कि उस वक्त लखनऊ तक दौड़-भाग की तब सीबीसीआईडी जांच हुई। सीबीसीआईडी ने 1993 में चार्जशीट लगाकर फाइल मुख्यालय भेज दी थी पर खाकी की ऊंची पहुंच के चलते एफआईआर दर्ज नहीं हो पा रही थी। कहा, अब वह नामजद पुलिसकर्मियों को कठोरतम सजा दिलाने के लिए न्यायालय में पैरवी करेंगे।
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वर्तमान में आनंदपुरी में रह रहे 76 वर्षीय देवी प्रसाद पाठक ने बताया कि 1991 में वह चकेरी में प्राॅपर्टी का कार्य करते थे। कांग्रेस के भ्रष्टाचार उन्मूलन मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष भी थे। उनका आरोप है कि उस समय महाराजपुर थानाध्यक्ष रहे विद्या सागर तिवारी ने उनसे 500 वर्गगज का प्लाॅट मुफ्त में मांगा। उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया।
उस समय बांदा के बबेरू निवासी उनका छोटा भाई राकेश कुमार पाठक और बांदा के ही ग्राम पनघरा (नरैनी) निवासी मामा जगदीश प्रसाद द्विवेदी यहां आए थे। दोनों उनकी लाइसेंस रायफल और दोनाली बंदूक लेकर श्यामनगर स्थित साइट पर रुके थे। अचानक तत्कालीन सीओ, तत्कालीन महाराजपुर थानाध्यक्ष विद्यासागर सहित 18 पुलिस कर्मियों ने उन दोनों के साथ ही दिनेश सहित दो फील्ड कर्मियों, रामादेवी चौराहे में होटल चलाने वाले दोस्त घसीटे कुशवाहा के बेटे लाली सहित सात-आठ लोगों को फर्जी मुठभेड़ दिखाकर जेल भेज दिया था। हाईकोर्ट तक पैरवी करने पर छह महीने बाद भाई, मामा आदि की जमानत हुई थी। न्यायालय ने भी 1997 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। उनके खिलाफ पहले कोई और मुकदमा नहीं था।
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पूर्व मुख्यमंत्री की पैरवी पर शुरू हुई थी जांच
बकौल देवी प्रसाद फर्जी मुठभेड़ के बाद उन्होंने स्थानीय पुलिस अफसरों से लेकर लखनऊ तक न्याय की गुहार लगाई, पर सुनवाई नहीं हुई। उसी साल उनके आग्रह पर पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी और पूर्व में राज्यपाल रह चुके मोतीलाल बोरा ने पैरवी की तो 1991 में ही सीबीसीआईडी जांच के आदेश हुए। सीबीसीआईडी के तत्कालीन इंस्पेक्टर केपी सिंह ने मौके पर जाकर जांच की। आसपास के लोगों से पूछताछ सहित अन्य साक्ष्य जुटाने के बाद मुठभेड़ को फर्जी बताया। इसमें शामिल महाराजपुर के तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर तिवारी सहित 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट लगाई थी। सीबीसीआईडी के तत्कालीन एसपी ने चार्जशीट मुख्यालय भेज दी थी जहां से यह शासन पहुंची। दूसरी तरफ आरोपी पुलिसकर्मी भी मामला दबाने के लिए भरसक कोशिश करते रहे। इसके चलते उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का आदेश नहीं हो पा रहा था। उन्होंने भी 1997 में भाई, मामा सहित फर्जी मुठभेड़ में फंसे सभी के बरी होने पर पैरवी करना कम कर दिया था। 35 साल बाद उन्हें एफआईआर दर्ज होने का पता चला पर अब वह शांत नहीं बैठेंगे।

इनसेट
भाई की हो चुकी है मौत
फर्जी मुठभेड़ से बरी होने के बाद देवी दयाल पाठक के भाई राकेश कुमार पाठक की 2003 में कृष्णानगर में सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उससे पहले वर्ष 2000 में राकेश की पत्नी का भी निधन हो चुका था। देवी दयाल ने बताया कि दिवंगत छोटे भाई की पांचों बेटियों का उन्होंने पालन पोषण, शादियां कीं। इनमें से सरकारी अस्पताल में डॉक्टर भी है।
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भूमाफिया और गैंगेस्टर का भी था आरोप
देवी प्रसाद पर उसी समय भूमाफिया होने का आरोप लगा था। चकेरी पुलिस ने गैंगेस्टर भी लगाया था। बकौल देवी प्रसाद वह सभी मुुकदमों से बरी हो चुके हैं।
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