धुआं, धूल इस मौसम में वातावरण की नमी पाकर धुंध के रूप में छा जाते हैं। सांस के जरिये पेड़ों की पत्तियों में पल रहे हानिकारक तत्व शरीर के अंदर पहुंच जाते हैं जिसकी वजह से फेफड़ा सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। इसकी हवा नहीं पेड़ों की पत्तियां हैं, श्वांस नली में भी धुआं, धूल कण जमा हो जाते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।
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हवा में प्रदूषण की मात्रा धीरे धीरे जरूर कम हो रही है लेकिन पेड़ों की पत्तियों पर प्रदूषित कणों की मोटी परत जमी हुई है। जब भी हवा चलेगी तो पत्तियों पर जमा ये प्रदूषित तत्व हवा में उड़ेंगे और लोगों के लिए फिर मुसीबत बनेंगे। कानपुर नगर निगम और अग्निशमन विभाग दो दिनों से पेड़ों पर पानी का छिड़काव जरूर कर रहे हैं लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं क्योंकि शहर बहुत बड़ा है और संसाधन न के बराबर।
पेड़ों पर जमी धूल बनेगी मुसीबत
मौसम विभाग के अनुसार नवंबर माह में पिछले छह वर्षों से बारिश नहीं हुई है। बारिश होने से पेड़ों पर जमा सभी धूल कण आसानी से धुल जाते हैं। इस बार भी बारिश की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। नवंबर माह में आखिरी बार 2010 में 26 मिलीमीटर बारिश हुई थी। उसके बाद से नवंबर में बारिश नहीं हुई। उधर, पिछले दो दिनों से उत्तर पश्चिमी हवा चलने से आसमान साफ हो गया है। हवा में प्रदूषण की मात्रा में भी कमी आ गई है। शनिवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 221 रहा जबकि पिछले हफ्ते यह 470 तक पहुंच गया था। वायु गुणवत्ता सूचकांक से ही प्रदूषण की मात्रा का पता चलता है। अब आने वाले समय में जब भी तेज हवा चलेगी, शहर में बिना किसी कोहरे और धुंध के ही प्रदूषण बढ़ जाएगा क्योंकि सड़कों से उठने वाले धूल और पेड़ों पर जमा धूल एक साथ उड़ेगी। प्रदूषण नियंत्रण विभाग का कहना है कि पत्तियों पर जमा धूल कण की परत काफी मोटी होती जा रही है। पिछले करीब 17 दिनों से प्रदूषण की स्थिति ज्यादा खराब होने से कानपुर शहर के हरे भरे दिखने वाले पेड़, धूल से भर गए हैं। इसकी वजह यह है कि रात में शीत अधिक पड़ने से शहर के ऊपर तैर रहे प्रदूषित कण नीचे एक परत के रूप में पेड़ों की पत्तियों पर आकर चिपक रहे हैं।
प्रदूषण के असर को साफ देखा जा सकता है
उद्यान अधीक्षक नगर निगम डा. वीके सिंह ने बताया कि पेड़ों की पत्तियों पर धूल और प्रदूषित कणों की मोटी परत जमा हो गई है, इसे कोई भी देख सकता है। साथ ही सड़कों के किनारे, निर्माणाधीन और अधूरी बनी सड़कों पर, फुटपाथों पर और डिवाइडरों के किनारे-किनारे भी धूल की परत देखी जा सकती है। इससे प्रदूषण के असर को साफ देखा जा सकता है।
क्षेत्रीय अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण विभाग कुलदीप मिश्रा ने बताया कि जिन क्षेत्रों की सड़कें खराब हैं और उस पर दौड़ने वाले वाहनों की संख्या अधिक है तो उसके आसपास स्थित पेड़ोें की पत्तियां धूल से भरी हाेंगी। यह धूल कण जब भी हवा के जरिए उड़ते हैं तो सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। जिससे फेफड़ोें और आंत पर असर पड़ता है।
आंखों पर भी असर पड़ता है
धूल कण जब भी हवा के जरिए उड़ते हैं तो सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं
- धुआं, धूल इस मौसम में वातावरण की नमी पाकर धुंध के रूप में छा जाते हैं।
- सांस के जरिये ये शरीर के अंदर पहुंच जाती है। जिसकी वजह से फेफड़ा सबसे ज्यादा प्रभावित होता है।
- श्वांस नली में भी धुआं, धूल कण जमा हो जाते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।
- ऐसे वातावरण में बाइक आदि चलाने से सांस की नली में सूजन (एक्यूट ब्रोंकाइटिस) हो जाती है। इससे खांसी के साथ बुखार भी हो सकता है।
- कभी-कभी मुंह खुला होने की स्थिति में यह हवा के जरिये मुंह में पहुंच जाती है, अचानक उल्टी और तेज खांसी शुरू हो जाती है।
- लगातार धूल कणों के संपर्क में आने से आंतों पर भी असर होने लगता है। इससे पाचन तंत्र बिगड़ जाता है।
- आंखों पर भी असर पड़ता है।
- सांस के मरीजों की तकलीफ बढ़ जाती है। कभी - कभी ऐसे मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ जाती है।
- जब भी बाहर निकले तो मुंह और नाक को किसी साफ कपड़े से ढक लें।
- दो पहिया वाहन से जा रहे हैं तो हेलमेट का इस्तेमाल जरूर करें, जिसमें आगे ग्लास भी लगा रहता है, उस तरह का हेलमेट ज्यादा सुरक्षित रहता है।
- आंख के बचाव के लिए चश्मा पहनें। यदि ऐसा संभव नहीं है तो ज्यादा देर बाहर रहने पर पानी से पूरे चेहरे और आंखों को जरूर धुलें।
- सुबह, शाम ऐसी जगह पर व्यायाम या प्राणायाम न करें जहां पर धुआं, धूल हो।
(डॉ. विशाल गुप्ता वरिष्ठ चिकित्सक मेडिकल कॉलेज)