फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Dr. BS Rajput: हाईस्कूल-इंटर में आई सेकेंड डिवीजन, मजाक उड़ाते थे रिश्तेदार, स्टेम सेल थैरेपिस्ट बन दिया जवाब

Sun, 12 May 2024 09:09 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: देश के माने-जाने स्टेम सेल थैरेपिस्ट डॉ. बीएस राजपूत का कहना है कि लोगों के तानों की चोट से दिल और मजबूत हुआ। मेरे डॉक्टर बनने की ख्वाहिश पर रिश्तेदार मजाक उड़ाते थे। तब भी तय किया कि अब डॉक्टर ही बनूंगा।
विज्ञापन
डॉ. बीएस राजपूत - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

14 जनवरी, वर्ष 1970 को लखनऊ में मेरा एक्सीडेंट हो गया था। मल्टीपल फ्रैक्चर थे। चार महीने हॉस्पिटल में रहा। इस दौरान सोचा कि मैं भी डॉक्टर बनूंगा। हाईस्कूल और इंटर भी सेकेंड डिवीजन आई। मेरे डॉक्टर बनने की ख्वाहिश पर नातेदार, मोहल्ले वाले मजाक उड़ाने लगे। कहते थे कि फर्स्ट क्लास वाले तो डॉक्टर बन नहीं पाते, सेकेंड में क्या डॉक्टर बनोगे।

विज्ञापन

मजाक का पात्र बना तो तय किया कि अब डॉक्टर ही बनूंगा। खूब मेहनत की और प्री मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) में चयन हो हुआ। यह कहना है कि जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के विजिटिंग प्रोफेसर और देश के माने-जाने स्टेम सेल थैरेपिस्ट डॉ. बीएस राजपूत का। उनका कहना है कि हाईस्कूल और इंटर में अंक आने का मतलब यह कतई नहीं कि जिंदगी में तरक्की के रास्ते बंद हो गए।

जीएसवीएम में एमबीबीएस में दाखिला मिला
पुख्ता इरादे तय करते हैं कि कोई किस बुलंदी तक पहुंचेगा। जिंदगी में आगे बढ़ने के असंख्य विकल्प होते हैं। अंक कम आएं तो न हौसला खोने के बजाय इसे और पक्का कर लेना चाहिए। डॉ. राजपूत बताते हैं कि लोगों के तानों की चोट ने दिल और मजबूत किया। रात-दिन पढ़ाई में जुटा। पीएमटी पास करने के बाद जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला मिला।

ब्रिटेन में एमसीएच में दाखिला मिला
वर्ष 1982 में एमबीबीएस के बाद वर्ष 1984 में यहीं से अस्थि रोग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद रॉयल लिवरपूल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ब्रिटेन में एमसीएच में दाखिला मिल गया। डॉ. राजपूत ने बताया कि एमसीएच में एडमिशन तो हो गया, लेकिन खर्च उठाने भर के पैसे नहीं थे तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी और मुंबई लौट आए। इसके बाद में कुछ मित्र चिकित्सा विज्ञानी ने स्टेम सेल में शोध कर रहे थे।
विज्ञापन

2007 में स्टेम सेल थैरेपी पर काम शुरू किया था
उनके कार्य से प्रेरणा लेकर फिर स्टेम सेल थैरेपी की दिशा में काम शुरू किया। स्टेम सेल थैरेपी के क्षेत्र में वर्ष 2007 में काम शुरू किया था, तब देश में दो-तीन विशेषज्ञ ही थैरेपी दे रहे थे। इस थैरेपी के संबंध में दूसरों को जागरूक भी किया। अब तक 10 हजार से अधिक रोगियों को थैरेपी दे चुके हैं। इसी सप्ताह एम्स दिल्ली में स्टेम सेल थैरेपी में विशिष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें