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बुन्देलखण्ड के लट्ठमार दिवारी नृत्य ने सबको लुभाया, सैकड़ों साल पुरानी है परंपरा

Tue, 17 Nov 2020 05:13 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चित्रकूट
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दिवारी नृत्य - फोटो : amar ujala
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चित्रकूट में भगवान श्रीराम की तपोस्थली के विभिन्न स्थानों पर सोमवार को दिवारी नृत्य का आयोजन किया गया। इसके अलावा परिक्रमा क्षेत्र में विभिन्न स्थलों पर दिवारियों का जमघट देखने को मिला। दिवारी नृत्य में शामिल टीमों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।
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इसके अलावा गांव-गांव में दीवारी नृत्य कर कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। यादव धर्मशाला अक्षयवट के परिसर में बुंदेलखंड के विभिन्न क्षेत्रों से आए ग्रामीणों ने ढोलक व नगाड़े की थाप पर विभिन्न प्रकार के गीत व लमटेरा गाकर भक्ति में सराबोर मयूर पंखों व घुंघरू की गूंज के बीच दीवारी नृत्य किया।

टीम के कलाकारों ने पटा बनैती, ऊंची व लंबी कूद की ऐसी कलाएं दिखाईं तो दर्शकों ने दांतों तले उंगली दबा ली। दीवारी नृत्य में शामिल टीमों का उत्साहवर्धन मौजूद दर्शकों ने किया। इस मौके पर रामऔतार यादव, देवीदीन यादव, मुन्ना सिंह, भाऊराम, रामपाल यादव आदि ने विजेता टीम के सदस्यों को पुरस्कार भी बांटे।
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दिवारी गीत दिवाली के दूसरे दिन उस समय गाये जाते हैं जब मौनिया मौन व्रत रख कर गांव-गांव में घूमते हैं। दीपावली के पूजन के बाद मध्य रात्रि में मौनिया-व्रत शुरू हो जाता है। गांव के अहीर-गडरिया और पशु पालक तालाब, नदी में नहा कर, सज-धज कर मौन व्रत लेते हैं। इसी कारण इन्हें मौनिया भी कहा जाता है।

इनके साथ चलते हैं गायक और वादक। वादक अपने साथ ढोल, नगड़िया और मंजीरा रखते हैं, तो कहीं-कहीं मृदंग और रमतूलों का भी उपयोग होता है। गायक जब छंद गीत का स्वर छेड़ता है तो वादक उसी अनुसार वाद्य यंत्र का उपयोग करता है। मौनिया कौड़ियों से गुंथे लाल, पीले रंग के जांघिये और लाल पीले रंग की कुर्ती या सलूका अथवा बनियान पहनते हैं, जिस पर झूमर लगी होती है।

पांव में घुंघरू, हाथों में मोर पंख अथवा चाचर के दो डंडे का शस्त्र लेकर जब वे चलते हैं तो एक अलग ही अहसास होता है। मौनियों के इस निराले रूप और उनके गायन और नृत्य को देखने खजुराहो में विदेशी भी ठहर जाते हैं।
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