अब बंदी भी बैंक में खाते खुलवा रहे हैं। इन खातों में वह जेल में काम कर की गई कमाई जमा करेंगे। इसके बाद वह खुद या उनके परिजन एटीएम या चेक के माध्यम से अपने पैसे निकाल सकेंगे। बैंक में खाता खुलवाने वाले बंदियों में माओवाद और दंगे का आरोपी भी शामिल है।
पांच सौ और एक हजार के नोट प्रचलन से बाहर होने के बाद शहर ही नहीं पूरे देश में खाते खुलवाने में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। बंदी भी अपनी जेल की कमाई को बैंक में सुरक्षित रखने के लिए खाते खुलवा रहे हैं। जिला जेल में बंद 17 बंदियों ने जेल प्रशासन की मदद से सिविल लाइंस स्थित सिंडीकेंट बैंक में खाते खुलवाए हैं। इनके खाते खुलवाने की पूरी प्रक्रिया जेल में ही पूरी कराई गई।
इन बंदियों में माओवाद का आरोपी कृपाशंकर सिंह और काला बच्चा की हत्या के बाद शहर में हुए दंगे का आरोपी गिरीशचंद्र वाजपेयी भी शामिल है। बंदी अंकित राठौर, कृष्ण कुमार सदनानी, अतीक अहमद और नियमुलज्जा ने भी अपने खाते खुलवा लिए हैं। जेलर एसपी त्रिपाठी ने बताया कि जन-धन योजना के तहत बंदियों के खाते खुलवाए जा रहे हैं। जेल में काम करने के बदले मिलने वाली राशि इनके खातों में ही जमा कराई जाएगी। अभी तक यह राशि जेल में रहती थी। बैंक में राशि जमा होने से बंदी जरूरत पर खुद पेशी जाते समय कचहरी में या अपने परिजनों के माध्यम से पैसे निकाल सकेंगे।
बंदियों ने भी खपाए बड़े नोट
जिला जेल में बंद कई बंदियों ने अपने पास रखे प्रचलन से बाहर हुए एक हजार और पांच सौ के नोट खपा दिए। इन बंदियों ने जेल में पैसे जमाकर कैंटीन के कूपन ले लिए। इस पैसे से वह जेल की कैंटीन से अपने लिए खाद्य सामग्री, कपड़े, जूते, चप्पल, टूथपेस्ट आदि जरूरत के सामान खरीद सकेंगे। जेलर एसपी त्रिपाठी ने बताया कि जेल प्रशासन यह नोट अपने बैंक खाते में जमा करा देगा।