आजादी की लड़ाई में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर क्रांति की लौ को कभी धीमा होने नहीं दिया था। इन्हीं महिला क्रांतिकारियों में से एक थीं अजीजन बाई। वह पेशे से तवायफ थीं। उन्होंने मस्तानी टोली बनाकर लगभग 400 महिलाओं को अपने साथ जोड़ रखा था। टोली की महिलाएं रात में मुजरा करके अंग्रेजों की रणनीति का पता करती थीं दिन में सूचनाएं क्रांतिकारियों को बताती थीं।
एक जून 1857 को जब कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में तात्याटोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदार टीका सिंह और शमसुद्दीन खान क्रांति की योजना बना रहे थे तो उनके साथ उस बैठक में अजीजन बाई भी थीं। 80 साल के इतिहासकार राम किशोर बाजपेई ने बताया कि अजीजन बाई मूलगंज की रोटी वाली गली में रहती थीं।
वहां पर अंग्रेज फौज के अफसर मुजरा देखने आया करते थे। एक दिन तात्याटोपे ने बिठूर में अजीजन बाई को नृत्य के लिए बुलाया था। तात्याटोपे इनाम स्वरूप अजीजन बाई को पैसे देने लगे तो अजीजन बाई ने इनकार करते हुए कहा कि मुझे पैसे नहीं अपनी सेना की वर्दी दे दीजिए। इसपर उन्होंने अजीजन बाई को अंग्रेजों की मुखबिरी करने का जिम्मा सौंपा था।