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बेटी जिंदाबाद

Mon, 16 May 2016 01:22 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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जरौली फेज-२ स्थित सरदार पटेल स्कूल के बच्चों ने मनाई शुशी। - फोटो : amar ujala
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कानपुर। कदम-कदम पर अभाव, मुश्किलों भरी जिंदगी के बीच शहर की बेटियों ने यूपी बोर्ड के एग्जाम में सफलता की नई कहानी रच दी है। किसी के पापा ट्रांसपोर्ट कंपनी में मुनीम हैं तो किसी के चाय और सब्जी बेचकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। रहने को अपना घर नहीं है, किराए के एक कमरे में न जाने कब से जिंदगी बीत रही है। अभावों ने बेटियों को इतना मजबूत बना दिया कि न सिर्फ पापा बल्कि पूरा समाज इन्हें सलाम कर रहा है। बिना कोचिंग अपनी मेहनत के दम पर बेटियों ने शहर का गौरव बढ़ाया है। ज्यादातर बेटियां साउथ सिटी में रहती हैं।
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पापा ने खुद की खुशियों से समझौता किया
हाईस्कूल में प्रदेश में तीसरी रैंक पाने वाली निशा साहू को जब फोन पर रिजल्ट के बारे में पता चला तो वह रो पड़ी। बेटी को रोता देख पिता रामशंकर साहू ने मोबाइल अपने हाथ में ले लिया। शिवाजी इंटर कॉलेज अर्रा के प्रिंसिपल दिनेश कुमार अवस्थी से बेटी की सफलता की जानकारी मिलते ही उनकी आंखों से भी खुशी के आंसू झरने लगे। पिता के आंसू देख बेटी उनसे लिपट पड़ी। मां संगीता साहू भी अपने आंसू नहीं रोक पाईं। फतेहपुर के जद्दूपुर अमौली के मूल निवासी रामशंकर साहू ने इसी दिन के लिए अपनी खुशियों का गला घोट दिया था। दो बेटियों के पिता रामशंकर के आंसू स्कूल में भी झरते रहे। बोले, साहब, बेटी ने सिर ऊंचा कर दिया। खाड़ेपुर कॉलोनी नौबस्ता में छोटे से घर में रहने वाली निशा ने रोज 10-12 घंटे पढ़ाई की। एमपी-आंध्रा रोड लाइंस यशोदा नगर में मुनीम रामशंकर साहू ने आठ हजार महीने की नौकरी में भी दोनों बेटियों की पढ़ाई से कोई समझौता नहीं किया।
ऑटो वाली की बेटी भी कम नहीं
शिवाजी इंटर कॉलेज केशव नगर में इंटरमीडिएट की छात्रा दीक्षा गुप्ता के पिता मीर गुप्ता आटो चलाकर परिवार का पोषण करते हैं। दीक्षा कहती हैं कि पिता ने कभी अभाव नहीं होने दिया। हमेशा मेहनत के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बर्रा में ऑटो चलाकर पिता हमेशा की हर छोटी-बड़ी जरूरतों को पूरा करते हैं। मां संध्या पढ़ाई के अलावा घर का कोई काम नहीं करातीं। दीक्षा को पढ़ाई बहुत अच्छी लगती है। वह 10-11 घंटे रोज पढ़ाई करती हैं।
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पिता की मौत ने मजबूत बना दिया
शिवाजी इंटर कॉलेज केशवनगर की इंटरमीडिएट की छात्रा नित्या पालीवाल के पिता विमलेश पालीवाल की तकरीबन छह साल पहले मौत हो गई थी। वे किसान थे। खेती पर पूरा परिवार निर्भर था। मां ज्योत्सना पाल ने मुश्किल हालात में बेटी को पाला। कर्रही में रहने वाली नित्या ने मजबूरी नहीं बल्कि मजबूती का दामन थामा है। कहती हैं कि मम्मी ने मेरे लिए अपनी खुशियां छोड़ दी हैं। मम्मी कहती हैं कि कभी हार मत मानना और हमेशा सही का साथ देना। भाई को राजस्थान में जॉब मिल गई तो परिवार की स्थिति कुछ सुधरी।
ड्राइवर हूं तो क्या हुआ, बच्चे अफसर बनेंगे
शिवाजी इंटर कॉलेज अर्रा में हाईस्कूल की छात्रा कामिनी सिंह के पिता इंदल सिंह ट्रक ड्राइवर हैं। खुद बहुत ज्यादा नहीं पढ़ पाए लेकिन ठान लिया था कि बच्चों को अफसर बनाएंगे। दिन-रात एक कर दिया। कामिनी की सफलता पर इंदल फूले नहीं समा रहे हैं। कहते हैं कि पिता और परिवार के कई लोग सेना में हैं लेकिन कम पढ़ पाने के कारण ट्रक ड्राइवर बन गया। शादी हुई तभी सोच लिया था कि बच्चों को उच्च शिक्षा दूंगा। कामिनी ने नाम रोशन कर दिया है। बड़ा बेटा राकेश सिंह बीएससी करने के बाद कंपटीशन की तैयारी कर रहा है तो छोटा बेटा योगेश सिंह बीएससी कर रहा है। मां उर्मिला सिंह और बुआ संगीता सिंह ने पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी है। अंकिता सेना में जाना चाहती हैं।
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