अशंधारकों की शिकायतों को खत्म न करने पर सेबी की ओर से कंपनियों को भारी अर्थदंड देना पड़ेगा। सूचीबद्ध कंपनियों के लिए पारित नए रेग्युलेशन में स्वतंत्र निदेशक के दायित्वों तथा कारपोरेट गवर्नेंस पर अधिक जोर दिया गया है।
यह अंशधारकों के हित में है। यह बात आईसीएसआई के सेंट्रल काउंसिल के सदस्य सीएस रंजीत पांडेय ने कही। वे रविवार को ब्रह्मनगर स्थित एक होटल में हुए सेमिनार में सीएस स्टूडेंटों व सदस्यों को कारपोरेट जगत में आए बदलावोें की जानकारी दे रहे थे।
उन्होंने बताया कि सूचीबद्ध कंपनियों के लिए एक दिसंबर 2015 से नया रेग्युलेशन पारित हुआ है। यह प्रत्येक लिस्टेड कंपनियों के साथ हर उस ग्रुप के लिए भी लागू है, जो अपनी प्रतिभूतियों को स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट करवाए हुए हैं।
कहा कि कंपनी सेक्रेटरी की यह अहम जिम्मेदारी है कि वह कंपनी पर लागू सभी नियमों और कानूनों की जानकारी रखे। इस मौके पर सीएस परीक्षा में रैंक पाने वाले स्टूडेंटों को सम्मानित भी किया गया।
यहां आईसीएसआई के नारदन रीजन के चेयरमैन सीएस मनीष गुप्ता, कानपुर चैप्टर के चेयरमैन वैभव शुक्ला, पूर्व चेयरमैन अंकुर श्रीवास्तव, समीर शुक्ला, वरिंदर कौर, गोपेश साहू, सौरभ गुप्ता, मनीष मौजूद रहे।
पांच करोड़ की कंपनी में सीएस अनिवार्य
कानपुर (ब्यूरो)। मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स की ओर से कंपनी एक्ट-2013 की जटिलताओं को कम करने के लिए कमेटी गठित की गई है। कमेटी के सदस्य सीएस अतुल मेहता ने बताया कि सौ तरह के संशोधनों के लिए एक फरवरी को पेश की गई रिपोर्ट पर 15 फरवरी तक विभिन्न कारपोरेट सेक्टर से सुझाव मांगे गए हैं।
नए प्रस्ताव में खास बात यह है कि अब पांच करोड़ रुपये टर्नओवर वाली कंपनी को पूर्णकालिक सीएस रखना अनिवार्य होगा। उन्होंने बताया कि नए प्रावधान के मुताबिक प्रबंधकों का वेतन जारी करने में शेयरधारकों की भी अनुमति जरूरी होगी, न कि केंद्र सरकार के अप्रूवल की। इसी तरह कंपनी में सेक्रेट्रियल स्टैंडर्ड को बढ़ावा मिलेगा।
एसोसिएट और सब्सिडियरी कंपनी के निर्धारण में केवल इक्विटी शेयर का हिस्सा शामिल किया जाएगा और अंश पूंजी प्राप्त करने के लिए कागजी काम में भी ढिलाई दी जाएगी। आईसीएसआई के पूर्व प्रेसिडेंट रहे श्री मेहता ने उम्मीद जताई कि मिनिस्ट्री मार्च में नोटिफिकेशन करके कंपनी लॉ में बदलाव कर देगी।