डॉ. बनदेव का जन्म फर्रुखाबाद के एक बाग में हुआ था। इस कारण उनकी दादी ने उनका नाम बनदेवी रखा था। स्कूली सर्टिफिकेट में उनका नाम बनदेव हो गया। तभी से उनका यही नाम आगे चलने लगा।
तीन साल में अपने पिता और शादी के कुछ दिन बाद ही पति की मौत पर भी रतन लोक अपार्टमेंट दर्शनपुरवा में रहने वाली बनदेव का हौसला नहीं डिगा। चाहे वह परिवार को संभालने की जिम्मेदारी हो या समाजसेवा। दोनों ही कामों को वह बखूबी निभा रहीं हैं।
पिता की मौत के बाद सबसे बड़ी समस्या उनकी पढ़ाई को लेकर खड़ी हो गई। हालांकि उनकी माता ने उनका सहयोग दिया। फर्रुखाबाद में जन्मीं बनदेव ने लखनऊ से एमडी की डिग्री हासिल की और समाजसेवा का मन बनाया। खुद को इसमें असफल मानकर उन्होंने डॉक्टरी बंद कर दी पूरी तरह से समाजसेवा में जुट गईं।
इसी बीच इनकी शादी हरदोई में हुई। दोनों से एक बेटी भी हुई। लेकिन शादी के कुछ साल बाद ही उनके पति की मौत हो गई। इससे डॉ. बनदेव खुद को असहाय महसूस करने लगीं। लेकिन समाज में और महिलाओं की दुर्दशा देखकर उन्होंने खुद को और मजबूत बनाया। इसके बाद वह कानपुर आ गईं।
मां और बेटी शुभांगी दोनों को संभालने के साथ ही समाजसेवा में और तेजी से जुट गईं। आज डॉ. बनदेव फैमली काउंसलिंग सेंटर में महिलाओं को निशुल्क परामर्श देती हैं। घरेलू हिंसा और भ्रूण हत्या के खिलाफ कार्यक्रम कर महिलाओं को जागरूक कर रहीं हैं।
‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और ‘एक्ट नाऊ’ अभियान के तहत लगातार इस मुहिम पर काम कर रही हैं। जरूरतमंद महिलाओं को घर पर निशुल्क ज्वैलरी डिजाइनिंग, फैशन डिजाइनिंग और प्रोफेशनल काम भी सिखाती हैं।
इतना ही नहीं डॉ. बनदेव समाज में बेटियों की हिस्सेदारी और महत्ता को जन-जन तक पहुंचाने के लिए हर साल शहर में ‘शुभांजलि प्रदर्शनी’ का आयोजन भी करती हैं। बनदेव आय के लिए नर्सरी टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट संचालित करती हैं।