गाय के साथ सुअर की भी होती है पूजा
यम द्वितीया के अवसर पर हमीरपुर के तपोभूमि में सदियों से चली आ रही ‘गाय-सुअर की कुश्ती’ परम्परा का निर्वहन जोश और उत्साह के साथ किया जा रहा है।
हर साल की तरह इस साल भी सदियों पुरानी परंपरा का साक्षी बना तपोभूमि ग्राउंड। गाय और सुअर की लड़ाई में अछाई की प्रतीक गाय जीती और बुराई का प्रतीक सुअर हार गया। मौका था गोवर्धन पूजा और यम द्वितीया का।
हमीरपुर की तमाम जगहों पर ग्रामीणों ने इस परंपरा का हर्षोल्लास के साथ निर्वाह किया। जिस व्यक्ति की गाय जीती, उसके मालिक को नकद पुरस्कार दिया गया। ग्वालों ने मुफ्त में लोगों को दूध का वितरण किया। लोगों ने बड़े ही चाव व प्रसाद भाव से दूध के लिए कतारबद्ध होकर दूध लिया।
इसलिए निभाई जाती है ये परम्परा
हमीरपुर के चंद्र प्रकाश यादव, सुनील, जग्गा आदि ने बताया कि गाय-सुअर लड़ाई की परंपरा बाप-दादा के जमाने से चली आ रही है। इसे बुराई पर अछाई के विजय के रूप में मनाया जाता है। सोनू ने बताया कि उनके पूर्वज बताते थे कि एक बार सुअर के रूप में एक दैत्य ने पृथ्वी पर यदुवंशियों के ऊपर घोर अत्याचार किया। भगवान कृष्ण ने गौ का रूप धारण कर अपने खुरों से उसका वध कर दिया। तभी से इसे निभाने की परंपरा चली आ रही है। इसमें गाय के साथ सुअर की भी पूजा की जाती है।