परमाणु बिजली अब थोरियम से बनाई जाएगी। महाराष्ट्र के तारापुर में 200 मेगावाट का एक एटॉमिक एनर्जी प्लांट लगाया जा रहा है। इसमें सफलता मिली तो परमाणु बिजली बनाने में भारत 2035 तक आत्मनिर्भर हो जाएगा। दूसरे देशों से यूरेनियम खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि अभी यूरेनियम से परमाणु बिजली बनती है। यह जानकारी भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) में सीनियर साइंटिस्ट विपुल सेन ने दी। विपुल ने हरकोर्ट बटलर टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) के दो दिवसीय (26-27 नवंबर) पूर्व छात्र सम्मेलन में हिस्सा लिया और बार्क के कामकाज की जानकारी दी।
बायो केमिकल इंजीनियरिंग (1982 बैच) में बीटेक, एमटेक करने वाले विपुल सेन ने बताया कि दुनिया का 70 फीसदी थोरियम भारत में है। 10 फीसदी थोरियम चीन के पास है। 20 फीसदी में दूसरे देश हैं। भारत ने थोरियम से परमाणु बिजली बनाने का काम शुरू किया। इसमें सफलता भी मिली है। इसे स्वदेशी रेडियो एक्टिव तकनीक नाम दिया गया है। रेडिएशन के जरिये यूरेनियम और प्लूटेनियम को थोरियम पर लाया गया है। 2035 के बाद भारत को यूरेनियम की जरूरत नहीं पड़ेगी। सीनियर साइंटिस्ट ने बताया कि पहले 200 मेगावाट के परमाणु बिजली केंद्र बनते थे, अब 2000 मेगावाट के प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं।
फसलों की पैदावार बढ़ेगी
साइंटिस्ट विपुल सेन ने बताया कि भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहा है। रेडिएशन की मदद से कीट न लगने वाले बीज विकसित किए गए हैं। इससे फसलों की पैदावार बढ़ेगी।
प्रति एकड़ में 2000 क्विंटल मूंगफली
अब प्रति एकड़ भूमि पर 2000 क्विंटल मूंगफली पैदा की जा सकेगी। बीज विकसित करने में बार्क के विज्ञानियों को सफलता मिल गई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों को बीज उपलब्ध कराए गए हैं। यूपी सहित देश के अन्य राज्यों मेें भी बीज जल्द उपलब्ध कराए जाएंगे। अभी तक प्रति एकड़ में करीब तीन से पांच क्विंटल मूंगफली पैदा होती है।
नहीं सड़ेंगे फल-सब्जियां
बार्क ने आलू, प्याज सहित अन्य सब्जियां, फल और खाद्य पदार्थों को सड़ने से बचाने की तकनीक ढूंढ निकाली है। एक अध्ययन के मुताबिक हर साल 20 करोड़ लोगों के काम आने वाले सब्जी, फल और खाद्य पदार्थ बरबाद हो जाते हैं। रेडिएशन के जरिये अब इसे सुरक्षित रखा जा सकेगा। कोई भी सामान एक साल तक नहीं खराब होगा। यह सेहत के लिए नुकसानदेह भी नहीं रहेगा।
कम समय में पकेगी फसल
रेडिएशन की मदद से बार्क के विज्ञानियों ने कम समय में फसल पकाने की तकनीक विकसित कर ली। साइंटिस्ट विपुल सेन का दावा है कि अब एक साल में एक खेत से चार-पांच तरह की फसल ली जा सकेगी। फसल चक्र भी सुरक्षित रहेगा। अभी तक एक साल में एक खेत से एक या फिर दो फसल ली जाती है। गेहूं, धान की बुआई पर ज्यादा जोर रहता है। बार्क की तकनीक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के जरिये किसानों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।