डॉ. सरोज राठौर
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अरे, यह कहां भर्ती कर दिया हमें। एक दवा तक नहीं दी किसी ने। यह दर्द था पिछले साल लॉकडाउन के दौरान अवसादग्रस्त लोगों का हौसला बढ़ाने वाली वीर नारी डॉ. सरोज राठौर का। कोरोना संक्रमण की पुष्टि होने के बाद हैलट में भर्ती होने पर उन्हें ढंग से इलाज तक नहीं मिला।
मौत से पहले उन्होंने सखी केंद्र की महामंत्री नीलम चतुर्वेदी को फोन कर कानपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों की दुर्दशा पर चिंता जाहिर की थी। नीलम चतुर्वेदी ने बताया कि डॉ. सरोज राठौर की तबियत आठ अप्रैल को खराब हुई। रात 10 बजे उन्हें मधुलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया।
उन्हें आईसीयू में रखा गया। नौ अप्रैल की सुबह जब कोरोना का टेस्ट हुआ तो रिपोर्ट पॉजिटिव आई। उसी रात 12 बजे उन्हें हैलट में भर्ती कराया गया। 10 अप्रैल को बात करती रहीं। यहां ढंग से इलाज न मिलने पर डॉ. सरोज ने एक रोगी का मोबाइल मांगकर नीलम चतुर्वेदी को फोन किया था।
बातचीत में उन्होंने इलाज में हुई लापरवाही की पोल खोली थी। 11 अप्रैल को हालत गंभीर हुई और देररात एक बजे उनकी मौत की खबर आई। नीलम चतुर्वेदी ने बताया कि महिला महाविद्यालय किदवईनगर में मनोविज्ञान विभाग से सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज सखी केंद्र की कार्यकारी बोर्ड सदस्य भी थीं।
उनके पति पति मुनींद्र सिंह भदौरिया वर्ष-1965 में भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए थे। पूर्व कैबिनेट मंत्री विद्यावती राठौर उनकी बुआ थीं। वह खुद समाजसेवी रहीं। कोरोनाकाल में लॉकडाउन की वजह से अवसाद के शिकार लोगों की वह निशुल्क काउंसलिंग करती थीं। इसके बावजूद उन्हें ढंग का इलाज नहीं मिल पाया।