आईआईटी कानपुर में सोमवार को उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्यौगिकी संस्थान (यूपीटीटीआई) की ओर से द्विदिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस की शुरुआत हुई। यहां दुनियाभर के टेक्सटाइल विशेषज्ञों ने ‘एडवांस टेक्सटाइल मैटेरियल एंड प्रोसेेसेज’ विषय पर चर्चा की। इस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य टेक्सटाइल क्षेत्र में चल रही रिसर्च और उसके बदलावों के बारे में छात्रों और प्रोफेसर्स को बताना है।
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एचबीटीयू के कुलपति प्रो. एनबी सिंह ने इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ किया। यूपीटीटीआई के निदेशक प्रो. मुकेश कुमार सिंह ने संस्थान में टेक्सटाइल पर जारी शोधों पर चर्चा की। उन्होंने कहा इस कॉन्फ्रेंस से प्राप्त नतीजों के आधार पर यूपीटीटीआई में नई शोध परियोजनाओं पर कार्य होगा। अभी संस्थान एंटी-माइक्रोबियल, फिल्टर फैब्रिक, थ्री-डी फैब्रिक पर काम कर रहा है।
निमकरटेक टेक्निकल सर्विसेज के सीएमडी उल्लास निमकर ने कहा कि बढ़ती आबादी एवं उसकी वस्त्र जरूरतों को ध्यान में रखकर शोध जारी हैं। दस वर्ष पहले तक यह शोध सिर्फ कागजों और पेटेंट के लिए ही होते थे, पर अब इन पर सतही तौर पर काम शुरू हुआ है। इससे सबको लाभ मिलेगा, चाहे वो आम आदमी हों, या अन्य क्षेत्र के। टेक्सटाइल विशेषज्ञ जयंत खेरा ने बताया कि टेक्सटाइल शिक्षा, तकनीकि और उद्यमिता का मिश्रण है। टेक्सटाइल इंडस्ट्री में सबसे बड़ी समस्या प्रदूषण है। कैसे प्रदूषण रोककर कपड़ा तैयार करें, जिससे पॉवर-पानी की बचत हो। बताया कि हम कपड़े तो पहन लेते हैं, उनके हानिकर प्रभाव के बारे में नहीं जानते।
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रंगों के लिए फॉमेल्डिहाइड केमिकल यूज होता है, जो हमारे लिए नुकसानदेह है। इससे कैंसर जैसी घातक बीमारी हो सकती है। टेक्सटाइल विशेषज्ञ प्रसाद पंत ने बताया कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री कपड़े में केमिकल का उपयोग बंद कर उपयोगी कपड़े तैयार करने पर काम कर रही है। कपड़े को साफ्ट करने, उसकी फिनिशिंग और चमक के केमिकल त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं। अब टेक्सटाइल ये कमियां दूर करेगी।
आईआईटी कानपुर
वैज्ञानिकों ने टेक्सटाइल मैटेरियल से विकसित कीं जन्तु कोशिकाएं
आईआईटी कानपुर में यूपीटीटीआई की ओर से दो-दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस आईआईटी दिल्ली के प्रो. एसएम इस्तियाक ने कहा कि जो हम पहन रहे हैं, वो टेक्सटाइल नहीं है। टेक्सटाइल आपके लाइफस्टाइल, हेल्थ, स्मार्टनेस, तकनीकि कार्यों में शामिल है। टेक्सटाइल ने इतनी तरक्की कर ली है कि इसके बनाए गए फैब्रिक का प्रयोग रोड बनाने में हो रहा है। डिफेंस सेक्टर में सेफ्टी के लिए इसका प्रयोग बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने में हो रहा है।
आईआईटी दिल्ली, एम्स, स्विेटजरलैंड, स्वीडन के वैज्ञानिकों ने पिछले 25 वर्षो में शोध के बाद टेक्सटाइल मैटेरियल से ह्यूमन सेल विकसित करने में सफलता पाई है। आईआईटी दिल्ली के प्रो. सौरभ घोष इस पर अभी भी काम कर रहे हैं। टिशू इंजीनियरिंग के तहत यह प्रोजेक्ट चल रहा है। गालब्लेडर, हार्निया, हार्ट के ऑपरेशन में इसका प्रयोग किया जा रहा है। मनुष्य के शरीर में किसी विशेष हिस्से में कैंसर की कोशिकाओं को हटाकर डॉक्टर इसका इंप्लांट कर रहे हैं।
त्वचा जलने पर पहले सर्जरी के दौरान शरीर के किसी अंग से त्वचा काट कर लगाते थे, पर अब इस टेक्सटाइल मैटेरियल से विकसित ह्यूमन सेल का प्रयोग किया जा रहा है। प्रो. इस्तियाक ने बताया कि विकसित होने के बाद टेक्सटाइल मैटेरियल से बनी कोशिका त्वचा में बदल जाती है। वैज्ञानिक इस मैटेरियल से आर्टीफीशियल लीगामेंट बना रहे हैं।
धूल और आग नहीं पकड़ेगा कपड़ा
आईआईटी दिल्ली के प्रो. बीके बोहरा ने बताया कि आग से बचाने के लिए एक फैब्रिक (कपड़ा) तैयार किया गया है, इसका प्रयोग कर्मचारी आग बुझाने में कर सकते हैं। इस कपड़े में विशेष प्रकार के कैमिकलों से 15 लेयर में कोटिंग है, जो कपड़े को आग से बचाएगी। प्रो. बोहरा ने बताया कि सेना के लिए ऐसे कपड़े तैयार किये गए हैं, जो माइनस डिग्री तापमान में उनके स्वास्थ्य की मॉनीटरिंग कर सकेंगे।
स्वाइल रेजिस्ट फिनिश फैब्रिक तैयार किया है, जो धूल नहीं पकड़ेगा और कम गंदा होगा। थ्री-डी फैब्रिक पर शोध चल रहा है। इससे कार्बन फाइबर बॉडी कंपोजिट मैटेरियल तैयार किया गया है। इस मैटेरियल का प्रयोग बोइंग विमान में हुआ है। इस मैटेरियल के प्रयोग से भार में 10 प्रतिशत की कमी आती है, जिससे सात प्रतिशत ईंधन की बचत होगी।
डीआरडीओ आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर बुलेट प्रूफ जैकेट के वजन को कम करने के लिए थ्री-डी मैटेरियल से जैकेट तैयार कर रहा है। इससे जैकेट के वजन में 50 प्रतिशत की कमी आएगी, जैकेट का वजन सिर्फ 2 केजी रह जाएगा। प्रो. बोहरा ने कहा भारत में बहुत सी छोटी चीजें विदेशों से इंपोर्ट होती हैं, ये देश में बनें तो बेहतर होगा।