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Kanpur News: शहर के निर्यातकों ने 100 करोड़ के ऑर्डर रोके, ईंधन महंगा होना तय

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कानपुर। अमेरिका-इस्राइल-ईरान युद्ध का प्रभाव शहर के निर्यात पर पड़ने लगा है। युद्ध के बीच कानपुर के निर्यातकों ने 100 करोड़ के ऑर्डर रोक दिए हैं। इस्राइल को शहर से सैडलरी, मशीनरी उत्पाद, डायमंड पॉलिश भेजा जाता है।
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खाड़ी देशों और ईरान को अलग-अलग प्रकार के खाद्य पदार्थ, चारा फूड सप्लीमेंट और चमड़ा उत्पादों का निर्यात किया जाता है। युद्ध के चलते माल और भुगतान फंसने के डर से निर्यातकों ने ऑर्डर रोक दिए हैं। ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइलें दागने से युद्ध का असर और गहरा हो गया है। गल्फ को-ऑपरेशनन काउंसिल (जीसीसी) देशों पर इसका व्यापक असर होगा। जानकारों का कहना है कि युद्ध के कारण ईंधन महंगा होना तय है। वहीं, मालभाड़ा भी 15-20 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। युद्ध से निर्यात मार्ग बदल जाएगा तो शिपिंग लागत और बीमा महंगा हो जाएगा।
हवाई क्षेत्र बंद होने से मध्य एशिया के देशों में समुद्र मार्ग से जाना होगा। इससे निर्यात लागत बढ़ सकती है। जानकारों की मानें, तो युद्ध से तत्काल और गंभीर प्रभाव शिपिंग की बढ़ती लागत और बढ़ती समय सीमा पर होगा। प्रमुख शिपिंग लाइनें केप ऑफ गुड होप के आसपास जहाजों को फिर से शुरू कर देंगी जिससे अनुमानित समय 14 से 20 दिन बढ़ जाएगा। इससे नए ऑर्डर रद्द होने की भी आशंका है। कानपुर से इस्राइल को सालाना 200-300 करोड़ और ईरान को 200-250 करोड़ के उत्पाद निर्यात किए जाते हैं। वहीं, ईरान से खजूर और अलग-अलग तरह के ड्राईफ्रूट आते हैं।
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युद्ध बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। दोनों देश एक-दूसरे पर लगातार हमले कर रहे हैं। गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल जीसीसी में बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। इने देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। ईरान ने इन सभी जगहों पर मिसाइलें दागी हैं। हाल ही में सरकार ने ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया था। इससे जीसीसी देशों में उत्पादों की पहुंच और बढ़ने की संभावना जताई गई थी। हालांकि, शहर से इन सभी देशों को 500-700 करोड़ का निर्यात किया जाता है। यदि युद्ध लंबा खिंचा तो ईंधन के दाम बढ़ने तय हैं। अमेरिकी टैरिफ से निर्यात पहले से ही प्रभावित है। यह युद्ध निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती लेकर आया है।
समुद्री वाहनों को बनाया जा सकता है निशाना

समुद्री रास्ते से माल जाने में भी संकट है। दरअसल, लाल सागर संकट का जोखिम पहले से ही है। हूती विद्रोहियों की ओर से समुद्री वाहनों को निशाना बनाया जाता है। युद्ध बढ़ने से इस रूट पर ही माल का आवागमन हो सकेगा। इस्राइल और ईरान के मार्ग के जरिये ही यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व के देशों में पहुंच होती है। हूती विद्रोहियों ने हमला करने का ऐलान भी किया है।
कंटेनरों की समस्या
ईंधन के दाम बढ़ने से लॉजिस्टिक कॉस्ट बढ़ने की संभावना है। कंटेनरों की समस्या भी गहराएगी। दरअसल, अमेरिका की ओर से पहले चीन पर भारी-भरकम टैरिफ लगाया गया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच समझौता हो गया। इससे चीनी कंपनियां तेजी से अपने ऑर्डर पूरे करने के लिए कंटेनरों को मंगाएंगी जिसका असर जल्द दिखेगा।

बातचीत
युद्ध की आहट पहले से ही निर्यातकों को थी। वे जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। इसके चलते इस्राइल, ईरान और अन्य खाड़ी देशों को भेजे जाने वाले 100 करोड़ के ऑर्डर फिलहाल रोक दिए गए हैं। ईरान और आसपास के क्षेत्रों में हवाई क्षेत्र के बंद होने से एयरलाइन को यूरोप और अन्य पश्चिमी बाजारों में कार्गो शिपमेंट के लिए लंबे, अधिक महंगे मार्गों को अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इसके चलते हवाई माल भाड़े में वृद्धि हो जाएगी।
-आलोक श्रीवास्तव, संयोजक, फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गनाइजेशन।
जीसीसी, इस्राइल और ईरान जाने वाले ऑर्डरों को तत्काल प्रभाव से रोक दिया गया है। अमेरिकी टैरिफ संकट अभी खत्म नहीं हुआ था कि एक नया संकट सामने आ गया है। रूस, यूरोप का रुख आगे क्या होगा, इस पर नजर रख रहे हैं। ईंधन महंगा होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
-असद ईराकी, क्षेत्रीय अध्यक्ष, चर्म निर्यात परिषद।
अमेरिका, ईरान और इस्राइल त्रिशंकु युद्ध निर्याकों पर व्यापक असर डालेगा। ईंधन महंगा होने से लॉजिस्टिक कास्ट बढ़ जाएगी। होर्मुज जलडमरू का आवागमन रूकने की आशंका है। इस मार्ग से ही 25 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति पूरी दुनिया को होती है। लाल सागर में हूती विद्रोहियों का संकट भी है।
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यादवेंद्र सचान, चर्म उत्पाद निर्यातक।
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