एक ऐसी जगह जो मुख्यमंत्री के लिए अपशगुन मानी जाती है। सीएम रहते कोई भी वहां जाने की गलती नहीं करता। इसकी वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे। दरअसल अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने के बाद से अभी तक कन्नौज के पास बसे छिबरामऊ नगर में एक बार भी नहीं आए। उनके यहां न आने के पीछे लोग एक अंधविश्वास की चर्चा करते हैं। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री के लिए यह नगर अपशकुन माना जाता है। मुख्यमंत्री रहते जो भी यहां आता है, उसकी कुर्सी चली जाती है।
हेमवती नंदन बहुगुणा से यह सिलसिला शुरू होता है। वह अपने कार्यकाल के दौरान वर्ष 1975 में छिबरामऊ आए थे और फिर यहां से जाते ही उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। इसके बाद मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र 1983 में यहां आए और कुछ दिनों बाद ही उन्हें भी अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। यही हाल नारायण दत्त तिवारी के साथ हुआ था। सीएम रहते वह यहां आए थे और उन्हें भी कुर्सी गंवानी पड़ी थी।
1987 में वीर बहादुर सिंह और फिर 1997 में छिबरामऊ की नई तहसील भवन का लोकार्पण करने आईं मुख्यमंत्री मायावती को भी अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। कहीं न कहीं इन सब चीजों को देखते हुए लोगों ने सीएम पद के लिए छिबरामऊ को अपशकुन मान लिया था।
प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 12 अप्रैल 2016 को कन्नौज से ही अन्य योजनाओं और परियोजनाओं के साथ छिबरामऊ के दिलू नगला गांव में बने सौ शैय्या अस्पताल को लोकार्पण किया था। वे छिबरामऊ विधानसभा क्षेत्र में तो आए, लेकिन छिबरामऊ नगर से दूरी बनाए रखी। उन्होंने छिबरामऊ से लगभग दस किलोमीटर दूर कस्बा सिकंदरपुर में जनसभा को संबोधित किया।