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यूपी: बांग्लादेशी किशोरी को वेश्यावृत्ति के लिए भारत लाने वालों को मिली सजा, भुगतनी होगी दस-दस साल कैद

Wed, 03 Mar 2021 11:49 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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सांकेतिक तस्वीर
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बांग्लादेशी किशोरी को वेश्यावृत्ति के लिए बिना पासपोर्ट वीजा के भारत लाने वाले एक बांग्लादेशी युवक व एक म्यांमार के शरणार्थी को अपर जिला जज सप्तम अभिषेक उपाध्याय ने दस-दस साल कैद और 26-26 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माने की 90 प्रतिशत धनराशि पीड़िता को दी जाएगी। विदेशी विषयक अधिनियम का भी दोषी पाए जाने पर शरणार्थी को पांच हजार रुपये अतिरिक्त अर्थदंड देना होगा।
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सियालदाह-अजमेर एक्सप्रेस के एस्कॉर्ट ने जीआरपी एसएचओ राममोहन राय को 26 अगस्त 2019 को सूचना दी थी कि ट्रेन के जनरल कोच में दो लोग एक किशोरी को जबरन बेचने के लिए दिल्ली ले जा रहे हैं। पूछताछ में किशोरी बांग्लादेश की और दोनों आरोपी रोहिंग्या मुसलमान निकले। बांग्लादेश के सतरवीरा निवासी अब्दुल रज्जाक व म्यांमार के आकयाब निवासी मो. अयाज को जीआरपी ने जेल भेज दिया था।

किशोरी को राजकीय बालिका गृह भेजा गया था। किशोरी ने बताया था कि भारत में रहने वाली उसकी मामी ने उसे नौकरी और अच्छे भविष्य का झांसा देकर भारत बुलाया था। बिना पासपोर्ट वीजा के नाव के सहारे सीमा पार कराकर मानव तस्करी में लिप्त गिरोह के लोग उसे भारत लाए और यहां वेश्यावृत्ति के धंधे में उतारना चाहते थे।
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इन लोगों की बातचीत से उसे शक हो गया और उसने ट्रेन में शोर मचाकर दोनों को पकड़वा दिया। एडीजीसी जितेंद्र कुमार पांडे व विवेक शुक्ला ने बताया कि अब्दुल रज्जाक के पास से बांग्लादेशी पासपोर्ट मिला था जबकि मो.अयाज के पास से शरणार्थी शिविर का कार्ड मिला था। पैरोकार सुभाष भास्कर ने बताया कि कोर्ट के निर्देश पर गवाहों को विशेष प्रयास से समय पर हाजिर किया गया।

पीड़िता के पुनर्वास को भी प्राथमिकता
कोर्ट ने आदेश में कहा है कि पीड़िता को अगर उचित संरक्षण नहीं मिला तो वह दोबारा मानव तस्करों के चंगुल में फंस सकती है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए), जिला प्रशासन व बांग्लादेशी उच्चायुक्त कार्यालय से समन्वय स्थापित कर पीड़िता को उसके घर तक सुरक्षित पहुंचाए।

मानव तस्करी के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था या किसी एनजीओ से मिलकर पीड़िता के पुनर्वास के लिए कदम उठाए और अगर भारत सरकार की किसी कल्याणकारी योजना से पीड़िता लाभान्वित हो सके तो योजना का लाभ दिलाने की कोशिश करें।

जांच की कमियों का लाभ अभियुक्तों को नहीं
कोर्ट ने माना कि पीड़िता व गवाहों के बयान से यह साबित है कि अभियुक्त पीड़िता को बेचने ले जा रहे थे। पीड़िता की मामी व अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी न होने, अभियुक्तों के तार भारत में कहां-कहां तक जुड़े हैं, इसका खुलासा न होने और जांच की कुछ कमियों के कारण अभियुक्त अपने अपराध से बच नहीं सकते। घटनास्थल रेलवे स्टेशन है, जहां हर यात्री को गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी होती है, ऐसे में कोई स्वतंत्र गवाह न मिलना घटना को संदिग्ध नहीं बनाता।

पीड़िता बोली, भारत में बनी आत्मनिर्भर
फैसला सुनने के बाद पीड़िता ने कहा भारतीय कानून पर पूरा भरोसा था। यहां से न्याय मिला और राजकीय बालिका गृह में रहकर हिंदी भाषा और सिलाई का काम भी सीखा। अब वह आत्मनिर्भर है। बांग्लादेश जाकर पढ़ाई करेगी और जरूरत पड़ने पर सिलाई को रोजगार का माध्यम बनाएगी। कैरम, कबड्डी और वॉलीबॉल उसके पसंदीदा खेल हैं।

बालिका गृह में रहने के दौरान उसे सबका स्नेह मिला। न्यायालय का फैसला सुनने के लिए प्रियंका पटेल, जबर सिंह व वीरेंद्र सिंह यादव की विशेष अभिरक्षा में राजकीय बालिका गृह से पीड़िता कोर्ट लाई गई थी। पीड़िता की ट्रेन से बरामदगी के समय भी प्रियंका और जबर उसके साथ थे।

मानव तस्कर गिरोह के चंगुल में फंसी पीड़िता को आखिर भारतीय न्यायालय से न्याय मिला। उसकी बांग्लादेश वापसी के संबंध में भी कोर्ट ने व्यवस्था दी है। - विवेक शुक्ला, एडीजीसी

कानपुर के न्यायिक इतिहास का पहला मुकदमा है। आठ गवाह पेश किए गए। बाहरी जिले में स्थानांतरित हो चुके गवाहों को भी समय पर बुलाकर गवाही कराई और बहस कर सिर्फ 42 दिन में न्यायिक कार्यवाही पूरी करा दी। -जितेंद्र कुमार पांडे, एडीजीसी

पीड़िता और गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास रहे हैं। न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं। अभियुक्तों के पास अपील करने का अधिकार सुरक्षित है। सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। - महेंद्र कुमार दुबे, बचाव पक्ष के अधिवक्ता

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एक नजर में न्यायिक कार्यवाही
26 अगस्त 2019 को अजमेर सियालदाह एक्सप्रेस से बांग्लादेशी किशोरी को दो रोहिंग्या मुसलमानों के साथ पकड़ा गया।
18 फरवरी 2020 को पुलिस ने कोर्ट में दाखिल कर दी थी चार्जशीट
16 जनवरी 2021 को कोर्ट में दोनों के खिलाफ तय हुए थे आरोप
19 जनवरी को पहले गवाह के रूप में पीड़िता के बयान दर्ज कराए गए
23 फरवरी को अभियोजन ने आठवें गवाह के बयान दर्ज कराकर गवाही समाप्त की
46 वें दिन में कोर्ट ने आरोप तय होने के बाद सुना दिया मुकदमे का फैसला

मुकदमे की खास बातें
कानपुर के न्यायिक इतिहास का पहला मुकदमा जिसमें न तो पीड़िता भारत की है और न ही आरोपी। अपराध भारत में हुआ है। इसलिए भारतीय कानून के तहत हुई मामले की सुनवाई। आरोपियों की ओर से कोई अधिवक्ता न होने पर उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए कोर्ट ने नियुक्त किया था न्याय मित्र।
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