चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया पर प्रचार की मनमानी रोकने के लिए नियम-कानून तो ढेर सारे बना दिए हैं, लेकिन उनका पालन करने में अधिकारी फेल होते नजर आ रहे हैं। इसकी बानगी है बिना अनुमति के फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर प्रत्याशियों द्वारा किए जा रहे प्रचार-प्रसार। नियम है कि सोशल मीडिया पर चुनावी प्रचार-प्रसार के लिए भी प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को आयोग की मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनीटरिंग कमेटी से अनुमति लेनी होगी, लेकिन आचार संहिता लागू होने के बाद से आज तक कानपुर के किसी भी प्रत्याशी ने फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार के लिए अनुमति नहीं ली है। हां, बल्क एसएमएस के लिए जरूर प्रत्याशियों ने अनुमति हासिल की है। कमेटी के नोडल अधिकारी संजय चौहान ने इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि अगर किसी तरह की शिकायत आती है तो वह कार्रवाई करेंगे।
ये हैं नियम
प्रत्येक जनपद में चुनाव आयोग की तरफ से मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनीटरिंग कमेटी (एमसीएमसी) गठित की गई है। सोशल मीडिया पर प्रचार-प्रसार से पहले एमसीएमसी ही अनुमति देगा। इसके लिए राजनीतिक दलों व प्रत्याशियों को फॉर्म-26 के पैरा-3 के तहत आवेदन करना होगा। एमसीएमसी के नोडल अधिकारी एडीएम फाइनेंस संजय चौहान ने बताया कि आयोग के इस निर्देश की जानकारी सभी राजनीतिक दलों को दी जा चुकी है।
खर्च के आकलन पर भी सावलिया निशान
आयोग ने सोशल मीडिया और वेबसाइट को रेडियो और केबल टीवी की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दर्जा दिया है। आयोग ने साफ किया है कि सोशल मीडिया मसलन ट्विटर, फेसबुक, यू-ट्यूब, विकीपीडिया और अन्य वेबसाइट या एप्स के माध्यम से होने वाले चुनावी प्रचार का खर्चा संबंधित प्रत्याशी के खाते में शामिल किया जाएगा। लेकिन अभी तक मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनीटरिंग कमेटी के पास सही तौर पर सोशल मीडिया पर प्रत्याशियों द्वारा स्पांसर करके किए जा रहे प्रचार-प्रसार का आंकड़ा भी नहीं है। ऐसे में इन खर्च में प्रत्याशी जरूर आयोग को गच्चा दे सकते हैं।
वोटिंग से दो दिन पहले सोशल मीडिया पर भी थमेगा प्रचार
नियमानुसार विधानसभा चुनाव के दो दिन पहले इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी चुनावी प्रचार-प्रसार बंद हो जाएगा पर सोशल मीडिया पर इसकी निगरानी भीसंभव नहीं दिखती।