विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार सिजेरियन प्रसव की दर 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में सरकारी अस्पतालों की स्थिति थोड़ी ठीक है। 80 से 84 प्रतिशत सामान्य प्रसव हो रहे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, कुल प्रसव में सिजेरियन की दर 10 से 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए लेकिन कानपुर के निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत को पार कर चुका है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों में सरकारी अस्पतालों की स्थिति थोड़ी ठीक है। इसमें करीब 80 से 84 प्रतिशत मामलों में सामान्य तरीके से प्रसव कराया गया है। इनमें सभी सीएचसी और जिला अस्पताल शामिल हैं।
विज्ञापन
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 यूपी के आंकड़े बताते हैं कि निजी क्षेत्र में सिजेरियन प्रसव का चलन तेजी से बढ़ा है। डफरिन अस्पताल में स्थिति बराबर है, रेफरल सेंटर होने के चलते यहां 40 से 50 मामले हाई रिस्क के भी आ जाते हैं तो ऐसी स्थिति में सर्जरी से ही प्रसव कराना पड़ता है। हैलट जच्चा-बच्चा अस्पताल में टर्सरी सेंटर हैं, जिसके चलते यहां भी सामान्य प्रसव से दोगुने तक सर्जरी की जाती हैं।
स्वास्थ्य विभाग से मिले पांच साल के आंकड़े
वर्ष
सर्जरी
सामान्य
2021-22
4445
23,838
2022-23
6154
28583
2023-24
7693
29814
2024-25
7815
26005
2025-26
8505
26200
विज्ञापन
डफरिन और जच्चा-बच्चा अस्पताल के 2 दिन
डफरिन अस्पताल में 18 अगस्त को आठ सामान्य और 16 सर्जरी से प्रसव हुए। 19 अगस्त को 17 सामान्य और 12 सर्जरी से प्रसव हुए। हैलट में 70 से 80 प्रतिशत महिलाएं रेफर होकर आईं, जिनमें जटिलताएं ज्यादा थीं। ऐसे में सर्जरी करनी पड़ी। यहां 18 अगस्त को आठ सामान्य प्रसव और 11 सर्जरी, 19 अगस्त को सात सामान्य प्रसव और 16 सर्जरी के जरिए प्रसव कराए गए।
नर्सिंगहोम में पैकेज का खेल
काकादेव, किदवई नगर और कल्याणपुर स्थित 4-5 मध्यम श्रेणी के निजी अस्पतालों के रियलिटी चेक से स्पष्ट हुआ कि यहां पैकेज सिस्टम का खेल चल रहा है। सामान्य प्रसव का खर्च जहां 15,000 से 25,000 के बीच है, वहीं सिजेरियन का पैकेज 60,000 से 1,00,000 तक पहुंच जाता है। ऑपरेशन के नाम पर अस्पताल का स्टे (बेड ऑक्यूपेंसी) 2 दिन से बढ़कर 5 दिन हो जाता है, जिससे दवाओं और जांचों का बिल दोगुना-तिगुना हो जाता है। बच्चे को मशीन में रखना और लंबे समय तक जच्चा के भी ऑक्सीजन पर रहने के नाम पर बिल बढ़ता जाता है।
उम्मीद नॉर्मल की, बन गए आपरेशन के हालात, मिला भारी-भरकम बिल केस 1-
काकादेव निवासी- 28 वर्षीय रेखा की पूरी प्रेगनेंसी रिपोर्ट सामान्य थी। डॉक्टरों ने अंतिम सप्ताह तक नॉर्मल डिलीवरी का भरोसा दिया। लेकिन प्रसव पीड़ा शुरू होते ही- बच्चे के गले में गर्भनाल फंसी है और बच्चा धड़कन छोड़ रहा है, का डर दिखाकर रात 2 बजे सिजेरियन कर दिया गया। अंतिम बिल 85,000 रुपये का थमाया गया।
केस 2-
एक नर्सिंगहोम में भर्ती कल्याणपुर निवासी ममता को 12 घंटे तक प्रसव पीड़ा में रखा गया। ऐन वक्त पर परिजनों से कहा गया कि पानी की थैली फट गई है। तुरंत ऑपरेशन न हुआ तो बच्चे की जान को खतरा है। आनन-फानन में दस्तखत कराकर ऑपरेशन किया गया और 92,000 रुपये वसूले गए।
डफरिन एक रेफरल सेंटर है। निजी अस्पतालों और सीएचसी से जब आखिरी समय में गंभीर मामले हमारे पास आते हैं तो हम पूरी कोशिश करते हैं कि बच्चा सामान्य तरीके से हो जाए लेकिन कई बार जच्चा-बच्चा की जान बचाने के लिए सिजेरियन ही एकमात्र विकल्प बचता है। - डॉ. रुचि जैन, सीएमएस डफरिन
हमारा टर्सरी सेंटर है। यहां पर काफी महिलाएं रेफर होकर आती हैं, जो गंभीर हालत में रहती हैं। गंभीर एनीमिया, हाई बीपी, शुगर और कई बार तो महिलाओं को झटके तक आने की स्थिति हो जाती है। ऐसे में हमें सर्जरी करना पड़ती है। पहले से भर्ती महिलाओं की हम पूरी कोशिश करते हैं कि सामान्य प्रसव हो। - डॉ. सीमा द्विवेदी, विभागाध्यक्ष हैलट जच्चा-बच्चा
कोई भी डॉक्टर जानबूझकर ऑपरेशन नहीं करता। आजकल महिलाओं में शारीरिक निष्क्रियता, देर से विवाह और अंतिम समय में बढ़ने वाले कॉम्प्लिकेशंस के कारण सिजेरियन करना पड़ता है। गैर-जरूरी ऑपरेशनों को रोकने के लिए हम एथिकल काउंसिलिंग करते हैं। - डॉ. मीरा अग्निहोत्री, चेयरपर्सन कानपुर ऑब्स एंड गायनी सोसाइटी
सरकार की मंशा है कि सामान्य प्रसव को बढ़ावा मिले। इसी दिशा में हम कार्य कर रहे हैं। निजी अस्पतालों के आंकड़ें तो सीधे हमारे पास नहीं आते हैं लेकिन समय-समय पर फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट आती रहती है, जिसमें निजी अस्पतालों के आंकड़ें भी आते हैं। सभी अस्पतालों को निर्देश हैं कि सामान्य प्रसव के लिए ही लोगों को जागरुक करें। - डॉ. हरिदत्त नेमी, सीएमओ