कानपुर। लॉकडाउन के समय और लॉकडाउन खुलने के तुरंत बाद पैदा हुए कच्चे माल के संकट का असर अब फुटवियर इंडस्ट्री पर दिखा है। बरसात में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक दाने (पीवीसी) व अन्य केमिकल से बने खास किस्म के जूते और चप्पलों की कीमत इस बार पिछले वर्ष की तुलना में 10 से 15 फीसदी अधिक है।
बरसाती फुटवियर का उत्पादन मार्च से मई तक होता है। मानसून आने से पहले ही ये बाजारों में पहुंच जाते हैं। इस बार इनका उत्पादन लॉकडाउन की वजह से देरी से हुआ। इस वजह से आपूर्ति का संकट तो रहा ही, साथ ही लॉकडाउन खुलते ही फुटवियर निर्माताओं को कच्चे माल की जरूरत पड़ी तो आपूर्तिकर्ताओं ने 10 से 15 फीसदी कीमत बढ़ाकर माल भेजा। इसका असर बाजार में पहुंचे उत्पाद पर दिखा है। ऑल यूपी रबर, हवाई फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष एलडी रूपानी बताते हैं कि वह दौर ही ऐसा था। मजदूरों की कमी हो गई थी। इस वजह से लेबर चार्ज अधिक था। ट्रकों का आवागमन भी प्रभावित था। इस कारण माल भाड़ा भी अधिक देना पड़ा। इसका असर लागत पर पड़ा।
यहां होती है खपत : बरसात में चमड़ा, रबड़ व पॉली यूरोथिन के बने जूते चप्पलों का कम इस्तेमाल होता है। बरसात में चमड़ा जल्दी खराब होता है और अन्य उत्पाद चलने में आरामदायक नहीं होते। इस वजह से खास इसी सीजन के लिए बरसाती फुटवियर बनाए जाते हैं। इसकी सबसे ज्यादा खपत खेत में काम करने वाले किसानों, ग्रामीण क्षेत्रों, पथरीले स्थानों व खदानों में काम करने वालों के बीच तो होती ही है। जलभराव, खराब सड़कों की वजह से शहरी लोगों में इसका चलन बढ़ा है। ये जूते चप्पल बरसात में फिसलते नहीं हैं। सस्ते होते हैं और खराब भी नहीं होते। इनका इस्तेमाल जुलाई से अक्तूबर तक ही होता है।
100 करोड़ का कारोबार : जिले में बरसाती फुटवियर का कारोबार सालाना सौ करोड़ रुपये से अधिक है। करीब दर्जन भर कंपनियां इस तरह के फुटवियर का उत्पादन करती हैं।
स्कूली जूतों के निर्माताओं का कारोबार चौपट : कोरोना संक्रमण की वजह से स्कूल बंद चल रहे हैं। इसका बुरा असर स्कूली जूता निर्माताओं के कारोबार पर भी पड़ा है। इस सीजन में करीब 150 करोड़ रुपये के स्कूली जूतों का उत्पादन नहीं हुआ। ये जूता भी प्लास्टिक दाने से बनता है। ऑल यूपी रबर, हवाई फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रदेश महामंत्री आलोक अग्रवाल बताते हैं कि हिंदी और इंग्लिश मीडियम के स्कूल यहां अलग-अलग सत्रों से संचालित होते हैं। फरवरी से लेकर जून तक दो बार कारोबार करने का मौका मिलता है। यहां से बाहरी जिलों और राज्यों तक माल जाता है। इस बार स्कूल खुले ही नहीं, इस वजह से उत्पादन ही नहीं हुआ। इससे रोजगार के अवसर भी कम हुए और कारोबारियों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।