एक वक्त वह भी था जब बुंदेलखंड को सपा और बसपा का गढ़ भी माना जाता था, मगर 2014 के चुनाव के बाद से ऐसी तस्वीर बदली कि सभी सीटें भाजपा के कब्जे में हैं। हालांकि पार्टी की जीत का सिलसिला 33 साल पहले 1991 के चुनाव में बांदा-चित्रकूट और हमीरपुर-महोबा संसदीय सीट से शुरू हुआ था। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जो प्रदेश में डबल इंजन की सरकार है, इसकी दो बोगियां 1991 के चुनाव में लग गई थीं। 1996, 1998 और 2014 व 2017 आते-आते पूरी डबल इंजन की सरकार आ गई।
बुंदेलखंड में भाजपा का पहला चेहरा कौन बना और किसने कितनी पारी खेली पर आधारित एक रिपोर्ट...
बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट
प्रकाश ने कांग्रेस और कम्युनिस्ट का तोड़ा तिलस्म
शुरुआत के कई चुनावों तक कांग्रेस का झंडा बुंदेलखंड में लहराता रहा। बीच-बीच में 1971 में जनसंघ व 1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने जीत के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। 1989 के चुनाव में राम सजीवन ने कम्युनिस्ट पार्टी से जीत हासिल कर लाल झंडा लहराया। यही वह दौर था, जब भारतीय जनता पार्टी भगवे के साथ चुनाव मैदान में उतरी। 1991 के चुनाव में इस सीट से भाजपा ने प्रकाश नारायण त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया। प्रकाश ने अपनी जीत से बुंदेलखंड में भाजपा का खाता खोला। वक्त कठिन था, तब तक क्षेत्रीय दल सपा और बसपा भी पैठ जमा चुके थे। लिहाजा 1996 में बसपा ने जीत दर्ज की, मगर 1998 में रमेश चंद्र ने यह सीट फिर भाजपा के कब्जे में कराई। इसके बाद भैरो प्रसाद मिश्र और आरके सिंह पटेल पार्टी की जीत की गारंटी साबित हुए।
हमीरपुर-तिंदवारी-महोबा लोकसभा सीट
विश्वनाथ की जीत के बाद कांग्रेस का सफाया
साल 1952 से लेकर 1989 तक के नौ चुनाव में एक बार 1977 लोकदल के तेज प्रताप सिंह और 1989 में जनता दल से गंगा चरण राजपूत की बात छोड़ दी जाए तो यहां की सीट कांग्रेस के कब्जे में ही रही। फिर आया लोकतंत्र का 10 वां पर्व यानि की साल 1991 का चुनाव, तब तक देश भर में राम नाम की लहर चल चुकी थी और इस लहर के बीच भाजपा के प्रत्याशी बनकर सीट से विश्वनाथ शर्मा मैदान में थे। राम की आंधी में कांग्रेस ही नहीं छोटे-छोटे दल भी उड़ गए। यहां से शुरू हुआ भाजपा की जीत का सिलसिला, जनता दल छोड़कर गंगा चरण 1996 में पार्टी के उम्मीदवार बने और जीत हासिल कर हिंदू वोट बैंक को मजबूत किया। यही वजह थी उन्हें दोबारा 1998 में टिकट मिला और उन्होंने लगातार दूसरी जीत हासिल की। इसके बाद 2014 से सीट पर भाजपा के कुंवर पुष्पेंद्र सिंह का कब्जा बरकरार है।
जालौन-भोगनीपुर-गरौंठा सीट
शुरुआत से भानु प्रताप ही रहे भाजपा का चेहरा
वर्तमान केंद्र सरकार में मंत्री भानु प्रताप ही इस सीट पर शुरू से लेकर अभी तक भाजपा का चेहरे रहे हैं। 28 साल में भानु पांच बार चुनाव जीतकर मानो जीत की गारंटी बन चुके हैं। वह भानु प्रताप ही थे, जिन्होंने इस सीट पर भाजपा को पहली जीत 1996 में दिलाई। इसके बाद से पार्टी को कोई उम्मीदवार रास ही नहीं आया। भानु ने भी बेदाग छवि के बूते पार्टी का भरोसा बनाए रखा। 1998 के बाद 1998, 2004 के चुनाव में भी जीत हासिल कर सीट भाजपा की झोली में डाल दी। 2009 में जरूर एक बार सपा ने उनसे कुर्सी छीनी, लेकिन 2014 में मोदी लहर ने एक बार फिर से भानु की ऐसी वापसी कराई कि 2019 का चुनाव भी भानु के नाम रहा। यही वजह है कि 2024 के चुनाव में भी भानु ही पार्टी का चेहरा बने हैं।