इत्र और आलू...कन्नौज की पहचान हैं। यहां का बना इत्र देश-दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंचता है। आलू उत्पादन में भी प्रदेश में कन्नौज का तीसरा स्थान है। यहां के लोगों के लिए यह दोनों ही उपलब्धियां गर्व का विषय हैं। रिश्वतखोरों ने इन दोनों को अवैध वसूली का कोड बना लिया है। किसी काम के बदले में रिश्वत लेने के लिए इन दोनों को कोड के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यहां बालू या मिट्टी खनन करने वालों से रिश्वत की वसूली भी आलू कोड से की जाती है।
एक दिन पहले किसी काम के बदले रिश्वत में आलू मांगने वाले दरोगा के निलंबन के बाद जो जानकारी सामने आ रही है, वह काफी चौंकाने वाली है। हालांकि पुलिस इस मामले की जांच के बाद ही पूरी तस्वीर साफ करने की बात कह रही है, लेकिन जानकार बता रहे हैं कि आलू दरअसल कोड के रूप में इस्तेमाल किया गया है। आलू कोड से रुपये की बात की जा रही है। पांच किलो आलू यानी पांच हजार रुपये की रिश्वत।
दरोगा और कॉलर के बीच बातचीत में पांच किलो, तीन किलो से होकर दो किलो में सौदा होने की बात दरअसल पांच हजार, तीन हजार के बाद दो हजार में सौदा की बात है। जानकार यह भी बता रहे हैं कि कई थानों और पुलिस चौकी में उस इलाके के कारोबार के मुताबिक कोड तैयार किया जाता है। पुलिस और उसके दलालों के बीच अमूमन किसी भी मामले के निपटारा के लिए रुपयों के लेन-देन की बात कोड में ही होती है। चूंकि कन्नौज में आलू की पैदावार ज्यादा होती है, इसलिए किसी को शक न हो तो आलू को ही रिश्वत के लेन-देन के लिए कोड के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मकसद यह है कि कोई तीसरा सुने भी तो उसे लगे कि सब्जी की बात हो रही है, जबकि बात रिश्वत की हो रही होती है।
आम है इत्र की शीशी की डिमांड
कन्नौज शहर में इत्र का कारोबार होता है और ग्रामीण इलाकों में आलू की खेती होती है। ऐसे में ग्रामीण इलाके के थानों और चौकियों में रिश्वत के लिए आलू शब्द का कोड है। जबकि शहर में इत्र कारोबार के तहत यहां रिश्वत के लेन-देन में शामिल होने वाले पुलिसकर्मी और दलालों के बीच इत्र का ही कोड इस्तेमाल होता है। अगर किसी मामले का निपटारा करने के लिए रिश्वत की मांग होती है तो रुपये के बजाय इत्र की शीशी मांगी जाती है। जितनी शीशी यानी उतने हजार रुपये। जानकार बताते हैं कि चूंकि यह लेन-देन इतनी गोपनीयता से अंजाम दिया जाता है कि आसपास वालों को भनक भी नहीं लगती। अगर कोई इत्र की शीशी की बात कर रहा होता है तो आसपास वालों को भी शक नहीं हो पाता है। यह सिर्फ इस खेल में शामिल होने वाले ही समझ पाते हैं।
ट्रॉली, चाय और मूंगफली भी है कोड में शामिल
न सिर्फ आलू और इत्र की शीशी बल्कि यहां अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग कोड तैयार हैं। जानकार बताते हैं कि बुंदेलखंड से यहां आने वाले बालू के वाहन तिर्वा में खड़े होते हैं। यहां पर बालू की मंडी भी है। बालू की गाड़ियों से भी रिश्वत की शिकायत सामने आती रहती है। यहां के लोग बताते हैं कि यहां लेनदेन के कोड में ट्रॉली शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। लेन-देन के लिए होने वाली आपसी बातचीत जितनी ट्रॉली कही गई है यानी उतने हजार रुपये की मांग है। चूंकि यहां अब मूंगफली की खेती भी तेजी से हो रही है, ऐसे में कुछ जगहों पर रिश्वत के कोड में मूंगफली शब्द का प्रयोग होने लगा है। कुछ पुलिस चौकियों में तो मामले के निपटारे के लिए चाय को भी कोड में शामिल किया गया है। सुनने में लगेगा कि चाय की मांग की गई है, जबकि हकीकत कुछ और होती है।