जिस जनपद में भाजपा का सांसद और तीन-तीन विधायक वहां पर पार्टी में बगावत के सुर पूरे चुनाव भर गूंजते रहे। अनुशासन की दुहाई देने वाली भाजपा में कोई भी नेता ऐसा नहीं निकला, जिसने बगावत को ठंडा या फिर खत्म करने का प्रयास किया। इसका परिणाम यह रहा कि हाथ की सीट हाथ से ही निकल गई और स्थिति इतनी बिगड़ी कि भाजपा प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई।
यह महाभारत टिकटों की घोषणा के साथ ही शुरू हो गई थी
केशव प्रसाद मौर्य
उरई नगर पालिका में भाजपा और बागी प्रत्याशी के बीच छिड़े महाभारत के आखिर में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने कमान तो संभाली वे इस कलयुग की महाभारत के कृष्ण न बन सके, जिसके कारण पार्टी के प्रत्याशी को न सिर्फ हार बल्कि चौथे पर आना पड़ा।
पालिका सीट पर अध्यक्ष पद की यह महाभारत टिकटों की घोषणा के साथ ही शुरू हो गई थी। पार्टी ने 40 साल पुराने नेता अनिल बहुगुणा को दरकिनार कर दिलीप दुबे को प्रत्याशी बनाया तो यहीं से युद्व का बिगुल बज उठा। वैश्य समाज ने बहुगुणा को चंदा कर चुनाव मैदान में उतारा तो भाजपा खेमे में खलबली मच गई।
सभी को लगा कि भाजपा फिर से खड़ी हो जाएगी
केशव प्रसाद मौर्य
पार्टी नेताओं ने बहुगुणा को साधने के लिए प्रदेश नेतृत्व तक से गुहार लगाई लेकिन किसी ने भी जिला स्तर पर हुई खींचतान के बीच पड़ना मुनासिब न समझा और लड़ाई चुनाव में आमने सामने तक पहुंच गई। ऐन वक्त पर जब 22 को वोट पड़ने थे तब 19 नवंबर को डिप्टी सीएम ने जीआईसी के मैदान में उतरने का मन बनाया। सभी को लगा कि शायद भाजपा फिर से खड़ी हो जाएगी, और बहुगुणा या तो बैठ जाएंगे या फिर हार ही जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
पूरे जनपद में भाजपा को जीत के लिए पसीने छुड़ा दिए
केशव प्रसाद मौर्य
न तो केशव की सभा में ही भीड़ जुटी और न ही भाजपा के वोटों में कोई बढ़ोत्तरी हुई बल्कि दिलीप ऐसा पिछड़े कि लड़ाई से खिसककर चौथे नंबर पर पहुंच गए। उनके चुनाव में भाजपा के जनप्रतिनिधियों की सक्रियता भी न के बराबर रही। बात उरई तक ही रहती तो भी गनीमत थी, एक जालौन को छोड़ दे तो बगावत की इस आग ने पूरे जनपद में भाजपा को जीत के लिए पसीने छुड़ा दिए।