कानपुर देहात के बहुचर्चित बेहमई हत्याकांड के समय पुलिस तीन से चार घंटे बाद गांव पहुंची थी। तब तक डकैतों ने लाशों के ढेर लगा दिए थे और भाग निकले थे। गांव में चारों तरफ लोगों की चित्कार मची हुई थी।
14 फरवरी वर्ष 1981 में दोपहर एक बजे फूलन देवी अपने साथी डकैत मुस्तकीम, रामप्रकाश, लालू सहित 40 लोगों के साथ असलहों व घोड़ों पर सवार होकर राजपुर ब्लॉक के यमुना किनारे के गांव बेहमई पहुंची थीं। इतनी बड़ी संख्या में डकैतों के आने से पूरे गांव के लोगों में दहशत फैल गई थी।
डकैतों ने गांव के घरों से लोगों को पीट-पीटकर बाहर निकाला और एक टीले पर ले जाकर 20 लोगों को गोलियों से भून दिया था। पूरा गांव में गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा था। महिलाएं जब पुरुषों को बचाने पहुंची तो डकैतों ने उन्हें टीले तक पहुंचने ही नहीं दिया।
घटना को अंजाम देने के बाद डकैत घोड़ों पर सवार होकर भाग निकले थे। गांव के कुछ लोग थाने पहुंचे और उन्होंने सूचना दी। इसके तीन-चार घंटे बाद जब पुलिस पहुंची तो गांव में चित्कार मची हुई थी। उस दिन बेहमई गांव की जमीन खून से रंग गई थी। घटना के बाद देश व विदेशी की मीडिया बेहमई गांव आई थी। पुलिस ने कई जगह छापेमारी की लेकिन मुख्य आरोपी फूलनदेवी को पकड़ नहीं पाए।
बेहमई कांड : 43 साल बाद आया फैसला, एक को उम्रकैद, एक बरी
कानपुर देहात के बहुचर्चित बेहमई कांड का 43 साल बाद कोर्ट ने बुधवार शाम फैसला सुनाया। एंटी डकैती कोर्ट के विशेष न्यायाधीश अमित मालवीय की अदालत ने श्यामबाबू (65) को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 50 हजार का अर्थदंड भी लगाया है। वहीं, एक अन्य आरोपी विश्वनाथ को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है।
सिकंदरा के बेहमई गांव में 14 फरवरी 1981 को दस्यु फूलन देवी ने सामूहिक नरसंहार की घटना को अंजाम दिया था। जिसमें 24 लोगों को एक लाइन में खड़ा कर गोली मारी गई थी। इसमें से 20 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी। जबकि छह लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। गांव के ही वादी राजाराम ने मुकदमा दर्ज कराया था।
मामले की सुनवाई एंटी डकैती कोर्ट में चल रही थी। बचाव पक्ष के अधिवक्ता गिरीश नारायण दुबे के अनुसार, 24 नवंबर 1982 तक मामले में 15 आरोपियों की गिरफ्तारी हुई थी। लेकिन फूलन देवी को पकड़ा नहीं जा सका था। इनके खिलाफ आरोप पत्र अदालत में दाखिल कर दिए गए थे।
मामले में कुछ आरोपियों के मध्य प्रदेश की जेल में बंद होने के कारण मुकदमे में उनकी हाजिरी न होने से लंबे समय तक आरोपियों पर आरोप तय नहीं हो सके। जिससे मुकदमे की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। इसी दौरान कुछ आरोपियों की मौत हो गई, जबकि कुछ की जमानत होने के बाद वे फरार हो गए थे।
वर्ष 2007 में आरोपी रामसिंह, रतीराम, भीखा व बाबूराम के खिलाफ पहली बार आरोप तय हुए थे। वहीं, 2012 में आरोपी पोसा, विश्वनाथ व श्यामबाबू के अलावा रामसिंह और भीखा पर दोबारा आरोप तय हुए थे। कोर्ट में हाजिर हो रहे सिर्फ पांच आरोपियों पर मुकदमा आगे बढ़ाया गया। जिला शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल ने बताया कि मामले में 31 साल बाद 24 सितंबर 2012 को मुकदमा वादी राजाराम की पहली बार कोर्ट में गवाही हुई।
अभियोजन की ओर से 2015 तक कुल 15 गवाह पेश किए गए। इसके बाद कानूनी दांवपेच में उलझे इस मुकदमे का फैसला आने में नौ साल लग गए। इस दौरान एक-एक कर सभी अभियुक्तों की मौत हो गई। सिर्फ श्यामबाबू और विश्वनाथ ही बचे थे। सबूतों और गवाहों के आधार पर बुधवार को कोर्ट ने श्यामबाबू को उम्रकैद की सजा सुनाई और उस पर 50 हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया है। विश्वनाथ को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है।
इनकी हुई थी हत्या
बेहमई नरसंहार कांड में तुलसीराम, राजेंद्र सिंह, सुरेंद्र सिंह, जगन्नाथ सिंह, वीरेंद्र सिंह, रामाधार सिंह, शिवराम सिंह, रामचंद्र सिंह, शिवबालक, बनवारी सिंह पुत्र महाराज सिंह, लाल सिंह, नरेश सिंह, दशरथ सिंह, वनवारी सिंह पुत्र लाखन सिंह, हिम्मत सिंह, हुकुम सिंह, हरिओम सिंह, राम अवतार सिंह निवासी बेहमई, तुलसीराम निवासी राजपुर तथा नजीर खां निवासी सिकंदरा की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई थी।