जन्मदिन विशेषः भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी
अपने भाषणों में अटल बिहारी अक्सर कनपुरिया कहावतों को दोहराते थे। हटिया खुली बजाजा बंद... झाड़े रहौ कलेक्टरगंज जैसी पंक्तियां उनके कानपुर के प्रति लगाव को प्रदर्शित करती थीं। लेकिन वह कानपुर से चुनाव लडने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। डीएवी कॉलेज के हॉस्टल में अटल के साथ रहने वाले उनके दोस्त बताते हैं कि उस दौर में मजदूरों के शहर में तत्कालीन सांसद एसएन बनर्जी को हराना मुश्किल था। कानपुर में कम्युनिस्टों का बोलबाला था, जबकि जनसंघ की जड़ें कमजोर थीं। यहां संघ का संगठनात्मक ढांचा ज्यादा अच्छी स्थिति में नहीं था। इसी कारण कानपुर से अच्छे रिश्तों के बावजूद अटल ने यहां से चुनाव नहीं लड़ा।