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बालदिवस: पढ़ने की उम्र में काम पर जा रहा छोटू, जिन हाथों से पकड़नी थी कलम वो कर रहे मजदूरी

Tue, 14 Nov 2017 07:22 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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लोहा पीटता बालक - फोटो : अमर उजाला
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आज बाल दिवस के मौके पर हम आपको कुछ ऐसी फोटो दिखाने जा रहे है जिसके बाद सरकार की बाल मजदूरी पर बड़ी-बड़ी बातें झूठी लगने लगेंगी। ये बच्चे किसी दूसरी दुनिया में नहीं रहते बल्कि उसी दुनिया में रहते हैं जिसमें बड़े-बड़े नेता रहते हैं और बड़े-बड़े अधिकारी भी रहते हैं। लेकिन उनकी आंखों पर ऐसा चश्मा लगा है जो सब कुछ देख कर भी अनदेखा कर देता है। इनके पास बड़े-बड़े फैसले लेने की तो समझ है लेकिन बाल-मजदूरों की उस मजबूरी समझने की समझ नहीं है जो इन्हें ये सब करने पर मजबूर करती है। ये फोटो आई हैं यूपी के औरैया जिले से।
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चाचा नेहरु के बाद बच्चों को मुक्त कराकर देश विदेश में नाम कमाकर नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर चुके कैलाश सत्यार्थी भले ही बाल मजदूरी के खिलाफ लड़ रहे हो मगर हालात उससे कहीं बदतर है। जिस उम्र में बच्चे के हाथों में कलम और किताब होनी चाहिए, उसमें उनके हाथ में कहीं झाड़ू है तो कहीं चाय की केतली। उनका बचपन सिसक रहा है। कम उम्र में ही उन्हें रुपये-पैसों का हिसाब किताब तो आ गया है लेकिन भविष्य का अंदाजा वह नहीं लगा पा रहे हैं। और तो और, सर्वशिक्षा अभियान भी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा ग्रहण कराने के दावे कर रहा है लेकिन होटल और ढाबों में मजदूरी करता बचपन विभाग की पोल खोलने के लिए काफी है।

मजदूरी कर अपना बचपन खो रहे बच्चे उसका मखौल उड़ाते ही प्रतीत होते हैं

सामान ढोता एक बालक - फोटो : अमर उजाला
बाल दिवस के महत्व से अनजान दुकानों आदि पर मजदूरी कर अपना बचपन खो रहे बच्चे उसका मखौल उड़ाते ही प्रतीत होते हैं। चाय की दुकान हो या फिर ढाबे, ज्यादातर जगह खिलौनों से खेलने की उम्र वाले बच्चे जूठे बर्तन साफ करते नजर आते हैं। छोटू एक ऐसा शब्द बन गया है, जो अब लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। नगर व आसपास के क्षेत्र में बने अलग-अलग चाय के खोखों, ढाबों व दुकानों पर काम कर रहे बहुत से बच्चे अपना असली नाम सुनने को भी तरस जाते हैं।

आखिर वो दिन कौन सा होगा। जब होटल, रेस्टारेंट, दुकानों आदि पर काम करने वाले बालक पढ़-लिखकर अपने भविष्य की इवारत लिखेंगे। पापी पेट की आग बुझाएं या पढ़ाई का खर्च निकालें। बाल श्रम रोकने वाली सरकारी योजनाएं सिर्फ कागजों में चलती हैं।आसपास नजर दौड़ाएं तो रेस्टोरेंट, ढाबों, वेलि्डंग आदि जगहों पर बच्चे काम करते हुए मिल जाएंगे। इस अपराध को रोकने के लिए प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, ऐसी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंचाया जा रहा है। बाल श्रम रोकने के लिए तमाम योजनाएं होने के बावजूद आज भी चारों ओर बाल श्रमिकों की भरमार है। सड़कों से लेकर दुकानों तक बालक मजदूरी करते नजर आ जाएंगे। 
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दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई का है प्रावधान

फलों की ठेली चलाता बालक - फोटो : अमर उजाला
बच्चों से मजदूरी कराने वाले दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है। 14 साल से कम आयु वाले बच्चों से काम कराने वाले दुकानदारों पर बीस हजार रुपये का जुर्माना व तीन साल की सजा का प्रावधान है लेकिन यहां पर न तो लोगों में जागरूकता है और न ही प्रशासन सख्त है, जिसके कारण अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।

अभियान चलाकर मुक्त कराए है बाल मजदूर 
श्रम परिवर्तन अधिकारी एसके मिश्रा बताते है कि कई बार अभियान चलाकर बाल श्रमिक मुक्त कराए है। उनका अभियान फिर चलेगा और ऐसे दुकानदारों पर कार्रवाई भी होगी।
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