गोपी की मौत को भी प्रबंधन छिपाए बैठा रहा। मीडिया तक बात पहुंचने के बाद अधिकारियों ने इसे स्वीकार किया है। मुकुंदपुर से लेकर मानिकपुर चित्रकूट मारकुंडी धारकुंडी, सती अनसुइया व बहिलपुरवा के जंगलों में दो साल के अंदर चार बाघ की मौत हो चुकी है।
घटिया भोजन तो नहीं मौत की वजह
सफारी में वन्य प्राणियों की मौतें टाइगर और अन्य वन्य जीवों के रख रखाव की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहीं हैं। सूत्रों की मानें तो सफारी में वन्य प्राणियों की मौत की बड़ी वजह घटिया किस्म का भोजन भी हो सकता है। सूत्र बताते हैं कि सफारी में मांसाहारी पशुओं के लिए भोजन सप्लाई करने वाले ठेकेदारों द्वारा यहां मृत पशुओं का मांस सप्लाई किया जा रहा है।
उसने सफारी की आड़ में स्लाटर हाउस का बस्ती के अंदर लाइसेंस लिया है। हालांकि टाइगर सफारी मुकंदपुर के निदेशक ने इस बात से इंकार किया है। कहा कि सभी जीवों को मानक के अनुरूप भोजन दिया जाता है।
शाही अंदाज में नजर आता था गोपी
नवंबर 2013 में गोपी को भिलाई अभ्यारण से टाइगर सफारी मुकुंदपुर लाया गया था, गोपी सफेद बाघ नर था। मुकुंदपुर टाइगर सफारी आने वाले दर्शकों के लिए गोपी सहजता से उपलब्ध हो जाता था। बाड़े में उछलकूद करने के साथ ही दौड़ना और अपने शहंशाही अंदाज में दर्शकों के समक्ष पिंजड़े के बाहर आकर बैठ जाना गोपी की आदत में शुमार था। उसकी मौत की जानकारी होने पर स्थानीय लोगों ने भी गहरा शोक जताया है और मामले की जांच कराने की मांग की है।