‘जमीन जल रही है फिर भी चल रहा हूं मैं, खिजा का वक्त है और फूल-फल रहा हूं मैं, हर तरफ आंधियां हैं नफरत की, फिर भी दीया हूं प्यार का हिम्मत से जल रहा हूं म्रैं’ ‘रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा, एक आई लहर, कुछ बचेगा नहीं, तुमने पत्थर दिल हमको कह तो दिया, पत्थरों पर लिखोगे नाम मिटेगा नहीं’ ‘अमर उजाला’ की ओर से आयोजित ‘अखिल भारतीय कवि सम्मेलन’ अमर वाणी 2015 में जाने-माने गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने यह रचनाएं सुनाईं तो मैदान में तालियों की गड़गड़ाहट के साथ वंस मोर-वंस मोर की आवाज गूंज उठी।
सम्मेलन में गीतों, शायरी और गजलों की ऐसी रसधार बही कि देर रात तक शहरी वाह-वाह, क्या खूब, बहुत खूब, क्या बात कहते रहे। देश के जाने माने गीतकारों, शायरों ने अपनी रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। रविवार को शहीद हेमू कालाणी पार्क सिंधी कालोनी शास्त्रीनगर में कवि सम्मेलन का आगाज हंसी के डोज से हुआ।
कॉमेडियन और लाफ्टर शो चैंपियन राजीव निगम ने मोबाइल और चार्जर की महत्ता को चुटीले अंदाज में श्रोताओं को सुनाया। अगली कड़ी में प्रदेश की राजनीति पर ‘कि पिछले कई वर्षों में दो पार्टियां पैदा हो गईं, इससे प्रदेश की नई परिभाषा पैदा हो गई’ रचना सुनाकर श्रोताओं से ठहाके लगवाए।
इसके बाद मशहूर गीतकार अंसार कंबरी ने सुनाया ‘शायर हूं कोई ताजा गजल सोच रहा हूं, फुटपाथ पर हूं, महल सोच रहा हूं’ गीत सुनाकर शाम को सुरमयी बना दिया। मस्जिद में पुजारी, मंदिर में नमाजी हो, किस तरह ये फेरबदल हो सोच रहा हूं’ गीत सुनाकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की।
जाने-माने कवि सोम ठाकुर ने ‘दुनियां की नजरों ने दिखाए कितने भेद हमारे मन को, वो भी चुप है मैं भी चुप हूं खोले कौन फिकरे मन के’ रचना सुनाई। इसके बाद ‘रूप तुम्हारा मन में कस्तूरी बो गया, मन जाने क्या से क्या हो गया।
वसीम बरेलवी ने ‘तेरी नजरों की हदें तुमको बताने के लिए और कुछ दिन में तेरा बेटा जवां हो जाएगा, खौफ के साए में बच्चे को अगर जीना पड़ा बेजुबां हो जाएगा, या बदजुबबां हो जाएगा’ गीत सुनाया। इसके बाद ‘जरा सा कतरा गर कहीं आज उभरता है, समंदर ही के लहजे में बात करता है’ गीत पेश किया।
उन्नाव के केडी शर्मा हाहाकारी ने ठेठ भाषा में ‘न हमका अमरीका पाई, ना पाई पाकिस्तान, मुर्दा तक जहां पेंशन पावै यहु है हिन्दुस्तान’। एबीसीडी भूल गए खाली सीडी लावत हैं, रंपत हरामी की नौटंकी लगावत हैं सुनाकर गिरती शिक्षा-सामाजिक व्यवस्था पर तंज कसा। फिरोजाबाद के यशपाल यश ने सुनाया ‘आप जब बुलाते हो दौड़ा चला आता हूं, गीत और गजल रूबाइयां सुनाता हूं। चूड़ियां इक नजर में प्यार को पहचान लेती हैं।
जीत यमराज से जातीं अगर वो ठान लेती हैं, रचना सुनाकर एक महिला के समर्पण को व्यक्त किया। इसके बाद कलम के सारथी मेरा भी एक अरमान लिख देना, शहादत के सफर का साज और सामान लिख देना, वतन पर सिर काटने का अगर अवसर मिले तुमको, लहू के कतरे कतरे से तुम हिंदुस्तान लिख देना रचना सुनाकर तालियां बजवाई।
वीर रस के कवि मदन मोहन समर ने ‘हम इसकी रज में खेले हैं, इस लिए अभिमानी हैं, हम धन्य हुए हम गर्वित हैं, क्यों कि हम हिन्दुस्तानी हैं, सुनाकर राष्ट्र प्रेम को दर्शाया।
डा. श्लेष गौतम ने ‘वो अपने दर्द को लेकर शिकायत रोज करता है, व्यवस्था और मौसम के सभी जख्मों को सहता है, कोई सुनता नहीं उसकी ना कोई साथ देता है, जो सबका पेट भरता है वो खाली पेट सोता है’ कहकर आम व्यक्ति की पीड़ा को दर्शाया।
अना देहलवी ने ‘दिल में जो है मेरे अरमान भी दे सकती हूं, सिर्फ अरमान ही नहीं ईमान भी दे सकती हूं मुल्क से अपने मुझे इतनी मोहब्बत है अना, मैं तिरंगे के लिए जान भी दे सकती हूं’ गीत पेश किया तो श्रोता झूम उठे। इसके बाद उन्होंने ‘मेरी चाहत भी था, वो मेरी अना भी था, मेरे खामोश लहजों की वो एक सदा भी था।
देता था मुझको जख्म वो बे-हिसाब मगर, हमदर्द भी था मेरी वो मेरी वफा भी था’ गीत पेशकर खूब वाहवाही लूटी। शकील जमाली ने ‘गजल इस्मत बचाती फिर रही है, कई शायर हैं बेचारी के पीछे’, जिसकी आंखों में शरारत थी, वो महबूबा थी, ये मजबूर सी औरत है ये घरवाली है कविताएं सुनाई।
हास्य कवि लटूरी सिंह लट्ठ ने सुनाया ‘समस्या थी विकट, मेरे पास था जनरल का टिकट, जनरल के डब्बे में थी भीड़ भाड़, चढ़ने का नहीं था जुगाड़....टीटी से क्या कहना है इस बारे में नहीं था सोचा तभी एक पुलिस वाले ने मुझे धर दबोचा’ के साथ हंसी-ठहाकों का सफर शुरू किया।
‘मेरे हाथ में सिर्फ इस लिए कोई दुख की रेखा नहीं है, माता-पिता के अलावा मैंने किसी भगवान को देखा नहीं है, माननीय मनमोहन का मन चुपके-चुपके रोता है, अब उनको मालूम पड़ा है पी एम कुछ होता है’ रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को हंसा-हंसाकर लोटपोट कर दिया।
मंच का संचालन राम किशोर त्रिपाठी ने किया। कार्यक्रम के संयोजक मुकेश श्रीवास्तव ने भी रचनाएं सुनाकर खूब तालियां बटोरीं।