13 अगस्त को कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि जब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आ जाता तब तक विश्वविद्यालय के छात्रों से पुराने नियम के तहत ही परीक्षा शुल्क लिया जाए। साथ ही कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर 30 अगस्त को सुनवाई करने का आदेश दिया है।
इसी दिन विश्वविद्यालय प्रशासन को जवाब दाखिल करने को कहा गया है। हाईकोर्ट ने इस मसले को 30 अगस्त के अपने टॉप-10 मामले की सूची में रखने को भी कहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बीते माह स्नातक (बीए, बीएससी, बीकॉम) में 885 रुपये से परीक्षा शुल्क बढ़ाकर 1185 रुपये कर दिया था। इसके अलावा प्रैक्टिकल और मौखिक परीक्षाओं के लिए अलग से सौ रुपये शुल्क देना था। इसी तरह परास्नातक (एमए, एमएससी और एमकॉम) में शुल्क 835 रुपये से बढ़ाकर 1385 रुपये कर दिया गया था।
बीएड के छात्रों का परीक्षा शुल्क 1300 से बढ़ाकर 1500, एमएड में शुल्क 1700 से दो हजार कर दिया गया था। बीएससी नर्सिंग के छात्रों को शुल्क एक हजार के बजाय दो हजार रुपये, बीएससी नर्सिंग चार वर्षीय प्रोग्राम में तीन हजार से बढ़ाकर चार हजार रुपये, एमबीबीएस, बीएमएस, बीयूएमएस के लिए शुल्क 7500 हजार रुपये से बढ़ाकर नौ हजार रुपये कर दिया गया था।
वहीं मेडिकल के पीजी कोर्स में शुल्क 10 हजार से बढ़ाकर 12 हजार, एलएलबी और बीए-एलएलबी में 1020 से बढ़ाकर 1500 रुपये कर दिया गया था। क्रीड़ा शुल्क भी बीस रुपये के बजाय 40 रुपये कर दिया गया था।
परीक्षा शुल्क बढ़ोतरी के खिलाफ याचिका दायर करने वाले पं. कुंदन लाल शुक्ला महाविद्यालय, रनिया के प्रबंधक डॉ. सतीश शुक्ला बताते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने दो वर्ष पूर्व ही परीक्षा शुल्क में जबरदस्त बढ़ोतरी की थी। अब एक बार फिर से इसमें काफी बढ़ोतरी की गई है।
यह शुल्क ग्रामीण क्षेत्र के छात्र देने में असमर्थ हैं। इसके अलावा जो बढ़ोतरी की गई है वह भी नियमों के विपरीत है। इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को पहले प्रदेश सरकार से अनुमति लेनी चाहिए थी। यही कारण है कि 15 महाविद्यालयों संग हमने इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी।
गलत तरीके से इकनॉमिकल वीकर सेक्शन (ईडब्ल्यूएस) कोटा लागू करने के मामले में भी विश्वविद्यालय प्रशासन चुप हो गया है। इसकी शिकायत छात्रों ने प्रदेश सरकार से भी की है। इसके अलावा अब छात्र और कुछ महाविद्यालय इसको लेकर हाईकोर्ट जाने की तैयारी में भी हैं।