राजपुर। बीहड़ के बेहमई गांव में 14 फरवरी 1981 को हुए नर संहार का दंश झेलने वाले वकील सिंह की गुरुवार को बीमारी से मौत हो गई। नरसंहार में गोली लगने के बावजूद भी वह जीवित बच गए थे। मगर नरसंहार का खौफनाक मंजर देखने से वह मानसिक बीमार हो गए थे।
बीहड़ में वर्चस्व कायम करने व बदला लेने की नीयत से डकैत फूलन देवी व उसके गिरोह ने 14 फरवरी 1981 को बेहमई में नरसंहार कर गांव की खुशहाली छीन ली थी। फूलन देवी ने गांव के बेकसूर 26 लोगों को लाइन में खड़ा कर उनपर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं थी। इसमें 20 लोगों की मौत हो गई थी जबकि छह लोग गंभीर घायल हो गए थे। घायलों में एक नाम वकील सिंह का भी था। डकैतों ने उसके सीने व पैर में गोली मारी थी।
गांव के बाबू जी सिंह बताते हैं कि वकील सिंह की इच्छाशक्ति ने उसे मरने तो नहीं दिया। मगर वह नरसंहार में अपनों के खून के लथपथ शरीर के बीच पड़े रहने का मंजर नहीं भुला सका। उपचार के बाद उसका शरीर तो स्वस्थ हो गया मगर दिमागी रूप से वह स्वस्थ न हो सका। यदि कोई उससे बेहमई कांड का जिक्र करता तो वह चिड़चिड़ा होकर उसे वहां से भगाने लगता। कई बार तो वह आक्रामक भी हो जाता था।
वह सिर्फ मवेशियों को चराने का ही काम करता था। वकील सिंह के बड़े बेटे रामकेश रिंकू ने बताया कि पिता लंबे समय से बीमार चल रहे थे। गुरुवार तड़के उनकी बीमारी से मौत हो गई। अनहोनी पर पत्नी गंगा देवी, बेटे चंद्रपाल व सिंह रोने लगे। वकील सिंह की मौत की जानकारी होने पर बेहमई में लोगों का जमावड़ा लग गया। बड़े बेटे रामकेश ने गांव के बाहर यमुना नदी किनारे उनका अंतिम संस्कार किया।
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14 फरवरी 2024 को आया था फैसला
बहुचर्चित बेहमई कांड में 43 साल बाद कोर्ट ने 14 फरवरी 2024 को फैसला सुनाया था। एंटी डकैती कोर्ट के विशेष न्यायाधीश की अदालत ने दोषी श्यामबाबू को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही 50 हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया था। वहीं एक अन्य आरोपी विश्वनाथ को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया था। इतनी लंबी न्यायिक कार्यवाही के दौरान कई आरोपियों और गवाहों की मौत हो चुकी है जबकि फैसले के इंतजार में वादी मुकदमा भी दम तोड़ चुका था।