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आप भी सोशल मीडिया पर पोस्ट या शेयर करते हैं ये चीजें तो हो जाएं सावधान

Sun, 30 Dec 2018 01:34 PM IST
शिखा पांडेय यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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अगर आप बगैर सोचे-समझे व्हाट्सएप, फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया पर फेक न्यूज या पोस्ट शेयर करते हैं तो अब सतर्क हो जाइए। अब ऐसी तकनीक तैयार हो रही है जिसके जरिए पलक झपकते ही फेक न्यूज और पोस्ट शेयर करने वाले की पूरी जानकारी मालूम हो जाएगी।
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इस तकनीक पर आईआईटी दिल्ली सहित दुनिया के कई वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। शनिवार को यह जानकारी आईआईटी दिल्ली के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के सीनियर प्रोफेसर और आईआईटी कानपुर के 1993 बैच के पूर्व छात्र प्रो. अमित कुमार ने बताई। वह यहां 1993 बैच के पुरा छात्र सम्मेलन में शामिल होने आए थे। प्रो. अमित ने बताया कि मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिए यह पता करना आसान हो जाएगा।

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इसपर काफी हद तक रिसर्च में सफलता मिली है। उन्होंने बताया कि ऐसी तकनीक का भी विकास किया जा रहा है जिससे फेक न्यूज या किसी भी तरह का गलत पोस्ट शेयर ही न हो सके। प्रो. अमित ने बताया कि मशीन लर्निंग के प्रयोग से डाटा कलेक्शन और मॉनिटरिंग का भी अच्छा काम हो सकेगा।

इससे गंभीर बीमारियों का तुरंत पता चल पाएगा। प्रो. अमित ने बताया कि हाल ही में केंद्र सरकार ने आईआईटी दिल्ली में क्लाउड कंप्यूटिंग का नेशनल सेंटर स्थापित कराया है। इस सेंटर से देशभर के शिक्षण संस्थान जुड़ेंगे और जब भी उन्हें किसी तरह का डाटा सुरक्षित रखना होगा या हासिल करना होगा उन्हें मिल जाएगा। इससे अलग-अलग शिक्षण संस्थानों को अपना डाटा सुरक्षित रखने के लिए अधिक हार्डवेयर या कंप्यूटर की जरूरत नहीं पड़ेगी। 

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आईआईटी कानपुर और दिल्ली मिलकर कर रहे काम
प्रो. अमित ने बताया कि इंडो-यूएस नेटवर्क ज्वाइंट सेंटर फॉर एल्गोरिदम पर आईआईटी कानपुर, आईआईटी दिल्ली और अमेरिका के दो विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के जरिए ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है जो किसी भी तरह के डाटा को आसानी से समझा सके।

दिमाग को पढ़ने की कोशिश कर रहे प्रो. विकास
एल्युमनाई मीट में ड्यूब यूनिवर्सिटी, यूएसए के सीनियर प्रोफेसर विकास भंडावथ ने भी शिरकत की। उन्होंने 1993 में यहां से इंटीग्रेटेड केमिस्ट्री की पढ़ाई की है। प्रो. विकास ने बताया कि वह फिलहाल न्यूरोसाइंस पर रिसर्च कर रहे हैं। पता करने की कोशिश कर रहे हैं कि इंसान का मस्तिष्क कैसे काम करता है।

प्रो. विकास ने बताया कि इंसान और मक्खी के दिमाग में काफी हद तक समानताएं हैं। इसलिए वह मक्खी के दिमाग पर ही अध्ययन कर रहे हैं। इस अध्ययन से यह आने वाले दिनों में हर किसी के दिमाग को पढ़ना आसान हो जाएगा।
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प्रो. विकास ने बताया कि मक्खियों के दिमाग में एक लाख न्यूरॉन होते हैं। प्रत्येक न्यूरॉन की अपनी अलग ही क्षमता होती है, जैसे की इंसान के न्यूरॉन की होती है। जेनेटिक टूल से वह कोशिश कर रहे हैं कि कौन से न्यूरॉन का क्या काम होता है। 

सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर से करेंगे गंभीर बीमारियों का इलाज
1993 में इंटीग्रेटेड एमएससी करने वाले देबानु दास भी कैंपस पहुंचे। उन्होंने बताया कि वह अपनी खुद की स्टार्टअप कंपनी संचालित कर रहे हैं। सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की मदद से वह ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं जिससे गंभीर बीमारियों का इलाज संभव हो सके। देबानु दास बताते हैं कि उनके रिसर्च में अभी कम से कम दस से पंद्रह साल लगेंगे लेकिन उन्हें पूरी उम्मीद है कि परिणाम बेहद अच्छा रहेगा। 
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