मंगल गीतों संग भक्तों ने मंगलवार को आचार्यश्री महाश्रमण को विदाई दी। मर्यादा महोत्सव के अंतिम दिन आचार्यश्री ने आनंदपुरी जैन मंदिर में सेवा को सच्चा धर्म बताया। कहा कि मनुष्य को बिना फल की चिंता किए ही सेवा कार्य करते रहना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि गुस्सा, अहंकार, छल और लालच से दूर रहकर दूसरों की सेवा करना ही सच्चा धर्म है। साधु, साध्वियों को आगम के सूत्र के अनुसार आचरण करना चाहिए।
उन्होंने अपने शिष्य, शिष्याओं और उपस्थित जनमेदनी को प्रेरणा देते हुए कहा कि हमारा यह धर्मसंघ आचार्य भिक्षु द्वारा प्रवर्तित है। उन्होंने 1859 में मर्यादा लिखी थी। आचार्य भिक्षु लिखित पत्र दिखाते हुए कहा कि यह पत्र तो धड़ है, इस पर लिखी मर्यादाएं प्राण हैं।
किसी भी व्यक्ति का जीवन मर्यादा के बिना नहीं चल सकता। साध्वी प्रमुखश्री कनकप्रभा ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्यश्री भिक्षु के साथ ही मर्यादा महोत्सव का इतिहास जुड़ा है।
सांसद देवेंद्र सिंह भोले और विधायक सलिल विश्नोई ने भी आचार्यश्री से आशीर्वाद लिया।
नेपाल में आचार्यश्री का अगला चातुर्मास
आचार्यश्री महाश्रमण जी ने बताया कि अगला चातुर्मास नेपाल के विराट नगर में होगा। कानपुर में मर्यादा महोत्सव बेहद सफल रहा। प्रदेश में यह पहली बार आयोजित हुआ है।