दो मासूम बच्चों के भविष्य की परवाह किए बगैर शादी के दस साल बाद मां-बाप ने अपने-अपने रास्ते चुन लिए। मां की बेवफाई पर पिता ने घर छोड़ दिया तो कुछ दिन बाद लौटी मां ने पति को घर में न पाकर फांसी लगा ली।
भावावेश में बच्चों के मामा ने ससुराल वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी। मुकदमेबाजी के बावजूद बच्चों के ताऊ, ताई और दादी ने बच्चों को घर में रखकर उनका पालन-पोषण किया। अच्छी शिक्षा दिलाकर उनका भविष्य संवारा।
11 साल की कानूनी लड़ाई में बच्चों की गवाही के बदौलत ताऊ, ताई और दादी दोषमुक्त हो गए। अपर जिला जज सप्तम अभिषेक उपाध्याय ने तीनों को बाइज्जत बरी कर दिया। लक्ष्मीनारायण गुप्ता की बहन संगीता का विवाह वर्ष 1999 में पुरानी दालमंडी निवासी मुकेश कुमार गुप्ता से हुआ था।
27 जनवरी 2010 की शाम संगीता की फांसी पर लटकने से मौत हो गई। लक्ष्मीनारायण ने जेठ राकेश, जेठानी प्रियंका व सास कमला देवी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में कलक्टरगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी थी।
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने तर्क रखा कि संपत्ति के बटवारे को लेकर घरेलू कलह के चलते संगीता बच्चों के साथ घर छोड़कर चली गई थी। कुछ दिन बाद जब लौटी तो पति मुकेश घर पर नहीं मिला। संगीता ने कोर्ट के माध्यम से ससुरालवालों पर पति को गायब करने का मुकदमा दर्ज कराया था।
इस पर ससुरालीजन संगीता को ताने देते और प्रताड़ित करके मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाते थे। इसी कारण संगीता ने फांसी लगा ली। बचाव पक्ष का तर्क था कि संगीता प्रेम में पड़कर घर से चली गई थी लेकिन धोखा मिलने पर लौट आई।
इस बीच पति भी घर छोड़कर चला गया था। आत्मग्लानि में संगीता ने फांसी लगा ली। अभियोजन की ओर से संगीता के भाई समेत आठ गवाह पेश किए गए, जबकि बचाव पक्ष की ओर से संगीता के दोनों बच्चों ने कोर्ट में गवाही दी।
दोनों पक्षों को सुनने और गवाहों व सबूतों के आधार पर कोर्ट ने माना कि घरेलू कलह के कारण संगीता ने घर छोड़ा, जब लौटी तो पति नहीं मिला। अवसाद के कारण संगीता ने फांसी लगा ली। जेठ राकेश, जेठानी प्रियंका व सास कमला देवी ने संगीता को खुदकुशी के लिए नहीं उकसाया और तीनों को दोषमुक्त करार दे दिया।
बच्चों ने दी पक्ष में गवाही
स्नातक की पढ़ाई कर रहे संगीता के बेटे शाश्वत और बेटी पावनी ने कोर्ट में गवाही दी कि मम्मी-पापा के समय से ही सब संयुक्त परिवार में रहते थे और कोई झगड़ा नहीं था। मामा ने गलतफहमी में रिपोर्ट दर्ज करा दी। दोनों को कभी साथ नहीं ले गए। ताऊ-ताई और दादी व चचेरे भाई-बहन साथ मिलकर रहते थे।
दोनों ने गवाही में कुछ दिनों के लिए मां के साथ घर छोड़कर जाने, वापस आने पर पिता के न मिलने और घटना के दिन घर पर ही मौजूद होने की बात भी कही थी। घटना के समय शाश्वत नौ और पावनी छह साल की थी। वर्ष 2013 में दादी ने राकेश और मुकेश दोनों के बेटों के नाम मकान के आधे-आधे हिस्से की वसीयत भी कर दी थी।
कोर्ट के फैसले से धुला मां पर लगा कलंक
कोर्ट ने माना कि मरने के बाद महिला पर चारित्रिक आरोप ठीक नहीं। पिछले 11 साल से बच्चे अपनी मां पर लगे कलंक को ही सच मानकर जीवन बिता रहे हैं। घटना के समय बच्चे मासूम थे। संगीता ने घर क्यों छोड़ा वह नहीं समझ सकते थे।
बचाव पक्ष भी प्रेम और धोखे की कहानी में मुख्य किरदार प्रेमी के बारे में कोई सबूत पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने प्रेम व धोखे के तर्क को नकारकर पति-पत्नी की कलह और अवसाद के चलते खुदकुशी की बात को माना और फैसले से संगीता पर लगे कलंक को भी धो दिया।