कानपुर। वाजिदपुर से प्योंदी गांव तक गंगा के किनारों पर सैकड़ों ग्लू भट्ठियां खुलेआम धधक रही हैं लेकिन प्रशासन मौन है। इनसे निकला गंदा पानी और कचड़ा गंगा में गिराया जा रहा है। आसपास के गांवों के लोग बदबू और प्रदूषण की वजह से परेशान हैं। ‘अमर उजाला’ संवाददाता अमित त्रिपाठी और फोटोग्राफर ओपी वाधवानी ने इन इलाकों का दौरा किया तो गंगा का दुर्दशा नजर आई।
शनिवार को जब संवाददाता वाजिदपुर पहुंचा तो देखा कि गंगा के किनारे किनारे वाजिदपुर से लेकर प्योंदी तक पूरे क्षेत्र में सैकड़ों ग्लू भट्ठियां धधक रही हैं। इन ग्लू भट्ठियों में महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी काम कर रहे हैं। लोगों से बात करने पर पता चला कि ये भट्ठियां पहले शाम 7 बजे के बाद चलती थीं लेकिन अब तो दिन-रात चल रही हैं क्योंकि कोई अधिकारी निरीक्षण ही नहीं करता। लोगों ने बताया कि ग्लू भट्ठियां में चमड़े की छीलन को गलाने के लिए तेजाब का इस्तेमाल किया जाता है जिससे ग्लू बनने की प्रक्रिया के दौरान कार्बन के कण उड़ने से सांस लेने में परेशानी हो रही है। कपड़े भी काले हो जाते हैं। रात में तो जानवरों की पूंछ, कान और अन्य बेकार अंगों का यूज भट्ठी को जलाने में किया जा रहा है। ग्लू भट्ठियों के संचालक चमड़े के छीलन को गलाकर मुर्गी का दाना भी बनाते हैं और सारा कचड़ा गंगा में बहाते हैं। लोगों ने आरोप लगाया कि भट्ठियां खोलने के लिये कुछ ग्रामीणों ने मोटी रकम लेकर अपनी जमीन किराए पर दे दी है। ये हाल तब है जब केंद्र सरकार गंगा सफाई को लेकर बहुत एक्टिव है। तीन दिन पूर्व ही नयी दिल्ली में हुई बैठक में गंगा में गंदगी फैला रहे उद्योगों को चेतावनी भी दी गई है।
गंगा किनारे स्थित ग्लू भट्ठियों की जानकारी मिली है। इसके लिए रिपोर्ट बना दी गई है। एक टीम भी बनाई गई है जिसमें एसीएम के अलावा नगर निगम, पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी शामिल हैं। जल्द ही कार्रवाई होगी।
टीयू खान, क्षेत्रीय अधिकारी, उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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सांस लेना मुश्किल, लोग हो रहे बीमार
कानपुर। ग्लू भट्ठियों के कारण वाजिदपुर, प्योंदी और आस-पास के गांवों के ग्रामीण काफी परेशान हैं। प्रदूषण की वजह से लोग बीमार हो रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बदबू के साथ ही सांस लेने में मुश्किल होती है। ग्लू भट्ठियों के संचालकों को मना करो तो वह लड़ने पर आमादा हो जाते हैं।
इलाके में रहना मुश्किल हो गया है। सांस लेने में परेशानी होती है। अब तो दिन में भी धड़ल्ले से भट्ठियां चल रहीं हैं। कोई इन पर प्रतिबंध लगाने का दमखम नहीं दिखा रहा है।
गंगा प्रसाद, ग्रामीण
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ग्लू भट्ठियों से निकलने वाले कार्बन से कपड़े खराब हो जाते हैं। बहुत मुश्किल में हैं। एक बार एडीएम सिटी शकुंतला गौतम ने सभी भट्ठियों को हटवा दिया था लेकिन अब कोई भी अधिकारी नहीं सुन रहा है। इससे ग्लू भट्ठियों के संचालकों के हौसले बुलंद हैं।
मैकूलाल, ग्रामीण
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कार्बन कण उड़ने से बच्चे बीमार हो जाते हैं। जिन लोगों की जमीन थी उन्होंने या तो अपनी जमीन बेच दी है या वह मोटी रकम लेकर अपनी जमीन को किराए पर उठाए हैं। वर्तमान में लगभग 100-125 भट्ठियां हैं। एयरफोर्स बाउंड्री के बाहर भी भट्ठियां लगी हैं।
विनोद यादव, ग्रामीण
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कोई अधिकारी कुछ तो करे। कुछ माह पहले लगभग 50 भट्ठियां थीं अब तो पूरे क्षेत्र में धधक रहीं हैं लेकिन सभी अधिकारी जान के भी अनजान बने हैं। रात में छत पर खुले में नहीं सो सकते क्योंकि सांस लेने में मुश्किल होती है।
जमुना नारायण, ग्रामीण