कानपुर। ‘केडीए के बाबू, इन पर नहीं किसी का काबू’ यूं ही नहीं कहा जाता। देख लीजिए, केडीए के ही पूर्व एकाउंटेंट के ईडब्ल्यूएस मकान की रजिस्ट्री ये बाबू लोग 37 साल तक लटकाए रहे। कभी फाइल नहीं है, कभी फाइल ऊपर गई है, कभी बाबू छुट्टी पर है आदि-आदि न जाने कितने बहाने बनाते रहे। बेचारे एकाउंटेंट साहब, रजिस्ट्री की आस में उनकी सांस छूट गई। फिर उनके सुपुत्र ने दौड़ लगाई और कमिश्नर से गुहार लगाई। बाबू लोगों ने कमिश्नर साहब को भी चलता कर दिया, उनको लिखकर भेज दिया कि रजिस्ट्री हो गई। सुपुत्र ने भी रिश्वत न देने की ठानी और दोबारा कमिश्नर से शिकायत की तो केडीए वालों के कान गर्म किए गए। अब अपर सचिव ने शनिवार को रजिस्ट्री करवाने का इंतजाम किया है।
केडीए में एकाउंटेंट पद पर तैनात रहे रामदेव मिश्रा को वर्ष 1977 में बर्रा-1 में ईडब्ल्यूएस की एक कॉलोनी एलाट हुई थी। इसका भुगतान भी उन्होंने कर दिया। बावजूद इसके रजिस्ट्री की बात पर केडीए के लोग अपने ही स्टाफ को तमाम बहाने बनाकर टहलाते रहे। इसी दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उनके बेटे सत्येंद्र मिश्रा ने इस मकान की रजिस्ट्री कराने का बीड़ा उठाया। जोन-तीन में आने वाले इस क्षेत्र के बाबुओं ने कभी उन्हें फाइल न मिलने की बात समझाई, तो कभी अवैध निर्माण किए जाने की बात कहकर रजिस्ट्री न करने पर अड़े रहे। इस बीच उन्हें बाबुओं की ओर से भेजे गए तमाम दलालों ने संपर्क किया, मगर उन्होंने रिश्वत न देने की ठान रखी थी। उन्होंने कमिश्नर से अपनी पीड़ा बताई तो कमिश्नर ने केडीए को पत्र लिखकर इस संबंध में जवाब मांगा। हैरानी तो तब हुई जब केडीए से कमिश्नर को पत्र में यह लिखकर भेज दिया गया कि रजिस्ट्री हो गई है। पीड़ित के दोबारा शिकायत करने के बाद इसकी पोल खुली तो नाराज कमिश्नर ने तमाम अफसरों को जमकर फटकारा। साथ ही अपर सचिव सीपी त्रिपाठी को तत्काल रजिस्ट्री करवाने के निर्देश दिए। अपर सचिव ने संबंधित जोन के बाबुओं को तलब किया और फाइल प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। अब फाइल भी मिल गई और सारी औपचारिकताएं भी पूरी हो गईं। शनिवार को रजिस्ट्री कैंप में रजिस्ट्री करवाई जाएगी।