डॉ. डीके सिन्हा, वरिष्ठ गुर्दा रोग विशेषज्ञ
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कानपुर किडनी फाउंडेशन के एक ताजा सैंपल सर्वे से पता चला है कि एक साल में 80 फीसदी रोगी ऐसे आए जिन्हें गुर्दा खराब होने के बाद मर्ज का पता चला। रोगियों का गुर्दा 50 से 80 फीसदी तक खराब हो चुका था। फाउंडेशन के सर्वे में 1072 रोगियों को शामिल किया गया है। सैंपल सर्वे में शामिल रोगियों की हिस्ट्री से गुर्दा खराब होने के 12 कारण पता चले हैं। इनमें सबसे पहला और बड़ा कारण मधुमेह रहा है। इसके बाद ब्लड प्रेशर ने शहरियों के गुर्दे खराब किए।
किडनी फाउंडेशन के संयोजक वरिष्ठ गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ. डीके सिन्हा ने बताया कि गुर्दे खराब होने के कोई शुरुआती लक्षण नहीं उभरते हैं। रोगी को कोई तकलीफ भी नहीं होती है। जब लक्षण आते हैं, गुर्दे खराब हो चुके होते हैं। जब तक रोगी डॉक्टर के पास पहुंच पाते हैं, उनके गुर्दे 50 से 80 फीसदी तक खराब हो चुके होते हैं। इनमें आधे रोगियों को डायलिसिस की जरूरत रहती है। कुल रोगियों में पांच फीसदी का ही गुर्दा ट्रांसप्लांट हो पाता है।
सर्वे में गुर्दा खराब होने के कारणों में मधुमेह, ब्लडप्रेशर, पेशाब का संक्रमण, प्रोस्टेट की बीमारी, यूरिक एसिड, बच्चेदानी का संक्रमण, रात में बिस्तर गीला करना, पेशाब के रास्ते में रुकावट, गुर्दे की टीबी, पथरी, पॉली सिस्ट, गुर्दे में रिफ्लैक्स आदि हैं। इसके अलावा जिन रोगियों के कोलेस्ट्राल और ट्राईग्लीसिराइड अधिक बढ़ होती है उनके पेशाब से भी प्रोटीन आने लगता है। इससे भी धीरे-धीरे गुर्दा खराब होता है। गुर्दे की सबसे जटिल खराबी हाई ब्लड शुगर और हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों में होती है।
पेशाब की प्रोटीन से ही पकड़ में आती गुर्दे की बीमारी
गुर्दे की खराबी शुरुआत में ही पकड़ में आ जाए, इसके लिए पेशाब में प्रोटीन की जांच करानी चाहिए। इस जांच को माइक्रो एल्ब्युमिन कहते हैं। कोई बीमारी न होने पर भी हर व्यक्ति अपने जन्म दिन पर वर्ष में एक बार अपनी ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, चर्बी, यूरिक एसिड और पेशाब की जांच करा ले। इतने से स्वास्थ्य सुरक्षित दायरे में रहेगा। - डॉ. डीके सिन्हा, वरिष्ठ गुर्दा रोग विशेषज्ञ