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राशन की किल्लत से जूझ रहे 50 परिवार भूखे रहने को मजबूर, न तो राशन कार्ड है और न ही लेबर कार्ड

Fri, 03 Apr 2020 06:41 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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खत्म हो गया राशन, भूखे रहना मजबूरी - फोटो : amar ujala
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कानपुर के मसवानपुर, पुरानी बस्ती में करीब 50 परिवारों के पास न तो राशन कार्ड हैं और न ही लेबर कार्ड। ऐसे में इन परिवारों को राशन की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। रोज-कमाने खाने वाले इन परिवारों को कहीं से कोई मदद भी नहीं मिल पा रहीं हैं। 
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यहां रहने वाले अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूर और ठेले वाले हैं। 22 मार्च से जनता कर्फ्यू लगने के बाद से कोई भी काम पर नहीं गया। लॉकडाउन लागू होने के बाद इन परिवारों के पास बचा-कुछा पैसा भी खत्म हो गया। कई घरों में राशन खत्म हो चुका है तो कई घरों में खत्म होने की कगार पर है।

इन परिवारों का कहना है कि उनके पास राशन कार्ड या फिर लेबर कार्ड नहीं है। कई बार उन्होंने राशन कार्ड बनवाने के प्रयास किए लेकिन उन्हें सुविधा नहीं मिल सकी। ऐसे में उन्हें सस्ते सरकारी राशन का लाभ नहीं मिल सकेगा। रोज-कमाने खाने के कारण ज्यादा पैसा पास नहीं है। ऐसे में अब राशन की किल्लत बढ़ने लगी है।
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इलाकाई लोगों का दर्द
रेसू ने बताया कि वो टेंट हाउस में दिहाड़ी पर काम करते थे। दस दिन हो गए काम पर नहीं गए । राशन और पैसा दोनों खत्म हो गया है। राशन व लेबर कार्ड नहीं बना। घर में पत्नी व बच्चे हैं। रसूलाबाद में घर है। सीमाएं सील होने के कारण घर भी नहीं लौट सकते हैं।

अन्नपूर्णा बोलीं रोज जो काम मिल जाता था वह करती थी। अब काम भी नहीं मिल रहा है। कई बार प्रयास किया लेकिन राशन कार्ड भी नहीं बना है । घर में कुछ नहीं बचा है। अब भूखे ही रहना पड़ेगा। - 

कैलाश शर्मा बोले साहब, दिहाड़ी मजदूर हैं।  अब कोई काम पर भी नहीं बुला रहा। कई बार राशन कार्ड और लेबर कार्ड बनवाने की सोची लेकिन नहीं बन पाया। घर चलकर देख लीजिए कुछ नहीं बचा। हम गलियों में रहते हैं। यहां कोई राशन देने नहीं आता।  

प्रभा यादव ने बताया घर में पति और बेटी है। पति दादा नगर में फैक्ट्री में रोजनदारी पर काम करते हैं। 10 दिन से काम पर नहीं गए। हमारे पास राशन कार्ड और लेबर कार्ड भी नहीं है। घर में राशन खत्म है। आगे के दिन कैसे कटेंगे समझ नहीं आ रहा। 

ननकू बोले साहब, कोई न कोई मजदूरी कराने ले जाता था। 10 दिन से बाजार बंद है। दो दिन से आसपास के घरों से मिलने वाले खाने को खाकर गुजारा कर रहा हूं । हम गलियों में रहते हैं यहां कोई भी राशन बांटने नहीं आता है।
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