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मुरझा रही चौबेपुर की पान की खेती

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शैलेश शुक्ला
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चौबेपुर (बिल्हौर)। किसी समय पान की अच्छी खेती के लिए दूर-दूर तक विख्यात चौबेपुर क्षेत्र संसाधनों के अभाव में अपनी पहचान खोता जा रहा है। कानपुर ही नहीं बल्कि लखनऊ पान दरीबा मंडी तक क्षेत्र से बड़ी तादाद में पहुंचने वाली पान फसल अब बेहद सीमित होकर रह गई है। पान की फसल के लिए पानी की कमी ने उत्पादकों को वर्षों पुराने इस कार्य से दूर कर दिया है। यही कारण है कि ब्लाक क्षेत्र के दर्जनभर गांवों में पान की खेती के लिए तैयार की गईं ज्याद भीटें (खेत) ज्यादातर बंजर होती जा रही हैं।
मालूम हो कि करीब दो दशक पहले तक क्षेत्र में बड़ी तादाद में पान की फसल की जाती थी, लेकिन पान फसल की सिंचाई के लिए लगने वाले पानी के उचित प्रबंध न होने से धीरे-धीरे क्षेत्र में पान उत्पादन का रकबा कम होता जा रहा है। मालौं, गजेनपुर, पचोर, महाराजपुर, फत्तपुर, उदेतपुर, बसंठी, बहरमपुर, बोझा आदि गांवों में पान की अच्छी पैदावार होती थी। सैकड़ों बीघा जमीन पर बनी पान की भीटों पर सुबह से शाम तक चौरसिया समाज के लोग काम करते नजर आते थे। क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादित पान कानपुर के अलावा लखनऊ की पान दरीबा मंडी में पहुंचता था। अपनी विशेषता के कारण चौबेपुर का देशी पान दूर-दूर तक प्रसिद्ध था, लेकिन बीते करीब एक दशक के दौरान बारिश कम होने और तालाबों में पर्याप्त जल संचयन न हो पाने से धीरे-धीरे पान उत्पादन का क्षेत्रफल कम होती चली गई। वर्तमान समय में इलाके के मालौं, उदेतपुर और फत्तेपुर गांव क ो छोड़ अन्य सभी गांवों मेंपान की फसल पूरी तरह बंद हो गई है। सर्वाधिक पान उत्पादन करने वाला गांव मालौं के रामविलास चौरसिया, राकेश चौरसिया, गोपाल, हीरा, हरिशचंद्र, सत्यनारायण और प्रेमचंद्र चौरसिया आदि बताते हैं पूर्व में बड़ी संख्या में लोग पान उत्पादन की खेती-बाड़ी करते थे। बताया कि गांव की करीब पचास बीघा भूमि पर अब पान उत्पादन वालीं भीटें खाली पड़ी हैं। पानी के अभाव में ज्यादातर पान उत्पादकों ने पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है, जहां बीते वर्षों में पर्याप्त बारिश न होने और क्षेत्रीय रजबहों में पानी न आने से गर्मी शुरू होते ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती है, इसलिए दिन में तीन बार पान की सिंचाई संभव नहीं है, इसलिए पानी के अभाव में पान की फसल खराब होने में देर नहीं लगती। बीते कई वर्षों से पानी किल्लत झेल रहे पान उत्पादकों पर अभी तक जिला प्रशासन की नजर नहीं गई है इसलिए चौरसिया समाज पान की खेती छोड़कर निजी कारखानों में छोटी-मोटी नौकरी करने को मजबूर हैं।
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गर्मियों में पान की होती दिन में तीन बार सिंचाई
चौबेपुर (बिल्हौर)। पान फसल बेहद नाजुक होती है छाया के अलावा दिन में तीन बार सुबह, दोपहर और शाम फसल की सिंचाई जरूरी है जिसके लिए उत्पादकों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। तालाबों के किनारे बनाई जाने वाली भीटों में उत्पादन होने वाले फसल को पानी का छिड़काव करके सीचा जाता है। जिसके लिए किसानों को तालाब से घड़ों में पानी भरकर लाना पड़ता है।
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सिंचाई किल्लत से पान पैदावार हुआ महंगा
चौबेपुर (बिल्हौर)। पान उत्पादन से जूड़े मालौं गांव के सत्यानारायण अशोक और रामचंद्र चौरसिया आदि ने बताया कि पानी के अभाव में पान की खेती पहले जैसी लाभकारी नहीं रही। तालाबों में पंपिंग सेट के सहारे पानी भरवाना पड़ता है। भीषण गर्मी के कारण कुछ ही दिनों तालाब सूख जाते हैं। महंगे डीजल के कारण तालाबों में पानी भरवाना आसान नहीं है वहीं कानपुर और लखनऊ मंडी माल पहुंचने में भाड़ा पर भी भारी खर्चा होता है। बताया कि 200 पान वाली ढोली की कीमत बाजार में 30 से 60 रु तक होती है।
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बरइनपुरवा के ग्रामीणों को मार्गदर्शन की दरकार
बिल्हौर। जिला उद्यान विभाग की कई लाभकारी योजना भीट में पान, कुदरू, परवल आदि की फसल उगाने वाले चौरसिया और बरई समाज के लोगों को नहीं मिल पाती। यही कारण है कि जनपद ही नहीं बल्कि प्रदेशभर में भारी मांग होने के बाद भी यहां के किसानों को अपनी उपज का उचित दाम नहीं मिल पाता। मालूम रहे कि अरौल, बरइनपुरवा में जनपद में सर्वाधिक कुदरू और परवल उत्पादित होता है और कन्नौज, हरदोई, शाहजहांपुर, लखनऊ , कानपुर देहात, औरैया, इटावा, मैनपुरी सहित दिल्ली और हरियाणा तक के व्यापारी यहां खरीदारी के िलए आते हैं, लेकिन मंडी समिति और उद्यान विभाग के द्वारा अरौल में किसानों के लिए कोई प्रबंध न होने से किसानों में मायूसी है।

 
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