अमर उजाला ब्यूरो
बांदा। शहर की सबसे पुरानी श्रीरामलीला (प्रागी तालाब) 1951 में शुरू हुई थी। तब इस पर मात्र 22 रुपये खर्च आया था। अब 66 वर्षों के बाद रामलीला में करीब तीन लाख रुपये खर्च पर हो रहे है। रामलीला के दिन तीन से बढ़कर 15 हो गए हैं। यानि साढे़ छह दशकों में महंगाई की लीला 4545 गुना बढ़ गई। सारा खर्च पहले भी चंदे से ही होता था और अब भी चंदे से ही रामलीला चल रही है।
इस रामलीला की शुरूआत शहर के तत्कालीन मशहूर सेठ चौधरी पन्नालाल अग्रवाल ने की थी। तीन दिनी रामलीला पर तब करीब 22 रुपये खर्च आता था। इसे शहर के कई सेठ और रामलीला प्रेमी आपस में मिलकर वहन करते थे। इनमें सेठ मन्नूलाल अवस्थी और बैजनाथ गुप्ता आदि भी हाथ बंटाते थे। धीरे-धीरे प्रागी तालाब रामलीला परवान चढ़ती गई। तीन दिन के आयोजन बढ़ते-बढ़ते अब 15 दिन के हो गए हैं।
शहर के बाहर प्रागी तालाब के पास रामलीला के आयोजन होते थे। रावण वध की लीला वहीं होती है। शेष लीलाएं शहर के मध्य महेश्वरी देवी मंदिर के नजदीक स्थित भव्य पक्के पंडाल और लंबे-चौडे़ परिसर में होती हैं। प्रबंध समिति उपाध्यक्ष अयोध्या प्रसाद गुप्ता ने बताया कि अब सबसे ज्यादा करीब डेढ़ लाख रुपये रामलीला मंचन के कलाकारों पर खर्च होता है। इसके अलावा 15 दिवसीय व्यवस्थाओं में पंडाल, बिजली सजावट आदि में खर्च होता है। ज्यादातर यह बजट हर साल चंदे से जुटाया जाता है। समिति का पैसा बैंक खाते में रहता है। मौजूदा में समिति प्रबंधक संतोष गुप्ता (जारी वाले) और अध्यक्ष विजय गुप्ता (सीए) हैं।
-1951 में शुरू हुई थी शहर की मुख्य प्रागी तालाब रामलीला
- मंचन तीन से बढ़कर 15 दिन, खर्च 4545 गुना बढ़ा
- सबके सहयोग से चल रहा है खर्चीला धार्मिक आयोजन