कानपुर देहात। परिषदीय व सहायता प्राप्त स्कूलों में संचालित मध्याह्न भोजन योजना के क्रियान्वयन में मानक व गुणवत्ता की अनदेखी की जा रही है। इसके साथ पौष्टिक आहार के रूप में वितरित होने वाले फल और दूध अधिकांश स्कूलों में कागजों में वितरित किया जा रहा है। भोजन लकड़ी के चूल्हे पर बनाया जा रहा है। मिडडे मील में हो रहे खेल का खुलासा रसूलाबाद तहसीलदार ने किया। उन्होंने निरीक्षण आख्या डीएम को भेज कर योजना की हकीकत उजागर कर दी है।
शासन ने परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए मिडडे-मील योजना के तहत प्रत्येक सोमवार को फल व बुधवार को दूध देने की योजना चलाई। योजना से बच्चों के सेहत पर कोई असर तो नहीं हुआ, लेकिन गुरुजी की सेहत जरूर ठीक हो रही है। स्कूलों के निरीक्षण की जिम्मेदारी लिए खंड शिक्षा अधिकारी भी अनदेखी कर रहे हैं जिससे योजना अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पा रही है।
स्कूलों में जब शिक्षक समय से नहीं जा रहे हैं तो इस योजना के क्रियान्वयन का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। रसूलाबाद क्षेत्र में तहसीलदार राजीव उपाध्याय ने निरीक्षण करके योजना की हकीकत उजागर कर दी है। 24 दिनों के निरीक्षण में कई स्कूलों में फल व दूध वितरण होते नहीं मिला। तहसलीदार ने इसकी रिपोर्ट डीएम को भेजकर योजना की हकीकत से उन्हें अवगत कराया दिया है।
इसी तरह अकबरपुर, सिकंदरा, सरवनखेड़ा, झींझक, राजपुर, मैथा आदि ब्लाकों में योजना के संचालन में खानापूरी की जा रही है। स्कूलों में धुआं न हो और साफ-सफाई रहे इसके लिए गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए गए थे, लेकिन कई स्कूलों में लकड़ी के चूल्हे में खाना बनता है। इसकी निगरानी के लिए गठित मां समूह भी निष्क्रिय हैं। समूह में शामिल छह माताओं में से एक भी स्कूल नहीं जाती हैं।
क्या हैं मानक
मिडडे-मील योजना के तहत प्राइमरी स्कूल के प्रति छात्र को 150 मिलीलीटर और उच्च प्राथमिक स्कूल के बच्चे को 200 मिलीलीटर दूध माह के प्रत्येक बुधवार को दिया जाना है। हर सोमवार को बच्चों को मौसमी फल वितरित किए जाने हैं। प्राधिकरण की ओर से प्रति बच्चा चार रुपये के हिसाब से दिए जा रहे हैं।
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स्कूलों में फल व दूध वितरण की मानीटरिंग के लिए खंड शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। फल व दूध वितरण न करने वाले स्कूलों के प्रधानाध्यापकों से जवाब-तलब किया जाता है।
संगीता सिंह, बीएसए