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रोजाना 15 लाख की खपती पालीथिन

Sat, 23 Jan 2016 11:25 PM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
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प्रदेश सरकार की ओर से पालीथिन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगने के बावजूद इसके प्रयोग का सिलसिला बदस्तूर जारी है। रोजाना जिलेभर में करीब 12 से 15 लाख रुपये कीमत की कई पालीथिन के पैकेट (कैरीबैग, पन्नी) का इस्तेमाल हो रहा है।
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वहीं अभी तक इसके स्थान पर कोई ठोस वैकल्पिक इंतजाम न होने के कारण न सिर्फ व्यापारी बल्कि ग्राहक भी पालीथिन का इस्तेमाल कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना पड़ा है कि अब लोग दुकानों के काउंटर या ठेली पर खुलेआम पालीथिन रखने की बजाय इधर-उधर छिपकर रखने लगे हैं।

बाजारों में शापिंग करने के लिए निकल रही महिलाएं भी पालीथिन के बैग पकड़े सामान लेकर आते-जाते नजर आ रही है। साड़ी, श्रृंगार और चूड़ी आदि की दुकानों पर पहुंचने वाली महिलाएं खरीदारी के बाद प्रसाधन संबंधी सामग्री प्लास्टिक की पन्नी में व साड़ियां प्लास्टिक के बैग में लेकर रवाना हुईं।
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ठठिया, तिर्वा, इंदरगढ़, सौरिख, जसोदा, जलालाबाद और गुरसहायगंज समेत अन्य ग्रामीण क्षेत्रों की बाजारों में कपड़े की दुकानों पर भी पालीथिन बैग का प्रयोग होते नजर आया। गुड़, शक्कर, दालमोठ आदि खाद्य पदार्थ पालीथिन में रखकर बिके। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड जैसे भीड़भाड़ वाली जगहों पर भी प्रतिबंध का तीसरे दिन कोई असर नजर नहीं आया।

एक ओर जहां सरकार के आदेश का पालन कराने के लिए सरकारी तंत्र की ओर से अभियान चलाने में देरी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि, समाजसेवी व स्वयंसेवी संगठनों का भी कोई अता-पता नहीं है। पर्यावरण जागरूकता का दंभ भरने वाले सामाजिक संगठनों की तरफ से भी इस ओर कोई मुहिम अब तक शुरू नहीं की गई है।

उधर, सभासद श्याम तिवारी का कहना है कि केवल सख्ती से काम नहीं चलेगा, बल्कि पालीथिन के प्रतिबंध को लागू कराने के लिए जन जागरूकता भी जरूरी है। राजनैतिक लोगों को भी इस मुद्दे पर आगे आकर प्रशासन का हाथ बंटाना चाहिए।
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