डायरिया रोग से बच्चों की होने वाली मौत को रोकने के
लिए चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया गया। इस मौके पर उन्हें कई महत्वपूर्ण
बचाव संबंधी जानकारियां दी गईं।
लखनऊ से आए डा. त्रिवदेश त्रिपाठी,
स्टेट प्रोग्राम मैनेजर अमित शुक्ला और ब्लाक सुपरवाइजर शशिवेंद्र सिंह
चंदेल ने बताया कि बच्चों में अधिकतर डायरिया रोग का खतरा बना रहता है। कभी
गलत खानपान से तो कभी संक्रामक रोग से भी डायरिया हो जाता है। इसमें घरेलू
तौर पर बच्चे को ओआरएस घोल के अलावा जिंक की गोलियां या सीरप अवश्य दिया
जाए।
चीनी, नमक का घोल लाभ तो पहुंचाता है, पर मिश्रण की सही मात्रा न हो
पाने से सही लाभ पीड़ित को नहीं मिलता है, इसलिए हर व्यक्ति को अपने घर में
ओआरएस घोल व जिंक की गोलियां व सीरप अवश्य रखना चाहिए। दस्त आने पर घोल के
साथ ही जिंक का भी प्रयोग किया जाए। इससे दस्त को रोका जा सकता है।
फिर भी
लाभ न मिले तो तत्काल नजदीकी चिकित्सक को दिखाकर उपचार लें। उन्होंने
कहा कि कई बार डायरिया के दौरान दस्त में खून आने की भी शिकायत बनी रहती
है। इसे भी खूनी डायरिया मानें और डायरिया का ही उपचार करें। डायरिया रोग
है या नहीं, यह जानने के लिए बच्चे के स्वभाव को जानें।
कहा कि पानी की कमी
हो जाने पर बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है। आंखें गड्ढे में चली जाती हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि डायरिया हो चुका है। ऐसे में तत्काल उसे चिकित्सक
को दिखाकर उपचार लें। चिकित्सक भी उपचार में लापरवाही न बरतें। इस मौके पर
सीएमओ डा. पीएन वाजपेयी, डा. पंकज राजपूत, डा. संजीव शाक्य, डा. श्रुति
श्रीवास्तव, डा. राहुल मिश्रा, डा. अजय यादव और डा. शोभित भरद्वाज के अलावा
दो दर्जन से अधिक चिकित्सक मौजूद थे।