कन्नौज। प्रदेश के कई जिलों में घोड़ों, खच्चरों और गधों में जानलेवा बीमारी ग्लैंडर्स के लक्षण पाए गए हैं। इससे पशु पालन विभाग की टीम सतर्क हो गई है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी ने तहसील व ब्लाकवार चिकित्सीय टीम का गठन कर नमूने लेने के आदेश दिए हैं। पशुओं के रक्त के नमूने लेकर परीक्षण के लिए हरियाणा के हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र भेजे जाएंगे।
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. अनिल कुमार सिंह ने बताया कि गधों, घोड़ों और खच्चरों को ग्लैंडर्स बीमारी होती है। अगर किसी पशु में यह बीमारी पाई जाती है तो गहरे गड्ढे खोदकर दफना दिया जाता है। इस बीमारी को फैलने से रोकने का एक यही उपाय है। अब अभियान चलाकर अश्ववंशी पशुओं का रक्त परीक्षण कराया जा रहा है। इससे कि ग्लैंडर्स से संक्रमित पशु की पहचान कर अन्य पशुओं को बचाया जा सके। इसके लिए पशु चिकित्सक घोड़ों, गधों और खच्चरों के रक्त के नमूने ले रहे हैं। पशुपालकों को इस बीमारी के लक्षणों और बचाव की जानकारी दी जाएगी।
25 हजार का मिलता है अनुदान
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अनिल कुमार सिंह ने बताया कि सरकार ग्लैंडर्स की चपेट में आए पशुओं को मारने से पहले उनके मालिकों को प्रति पशु 25 हजार रुपये का मुआवजा दे रही है। इससे कि पशुपालक की क्षतिपूर्ति हो सके। यह बीमारी पशुओं से इंसानों में भी फैलने की आशंका रहती है। इससे सतर्कता बरतने की जरूरत है। इस बीमारी से संक्रमित होने पर शुरुआती दौर में ही उपचार संभव है।
ऐसे फैलता है ग्लैंडर्स रोग
ग्लैंडर्स संक्रामक रोग है। इस बीमारी के बैक्टीरिया कोशिकाओं में प्रवेश कर जाते हैं। इलाज से भी ये पूरी तरह नहीं मरते हैं। ऐसे में दूसरे जानवर और इंसान भी इससे संक्रमित हो जाते हैं। यह बीमारी ऑक्सीजन के जरिए फैलती है। शरीर में गांठें पड़ जाती हैं। गांठों में संक्रमण होने के कारण घोड़ा उठ नहीं पाता है। साथ ही पशु खांसी से ग्रसित हो जाता है। नाक से स्राव निकलता है। बाद में मौत हो जाती है।
ये हैं बीमारी के लक्षण
-गले व पेट में गांठें पड़ जाना।
-जुकाम होना या लसलसा पदार्थ निकलना।
- श्वांस नली में छाले व फेफड़े में इंफेक्शन होना।
-बीमारी के दौरान थकान व आलस आना।
ऐसे करें बचाव
-पशु को समय पर ताजा चारा व पानी दें।
-ज्यादा देर तक मिट्टी-कीचड़ में न रहने दें।
-साफ-सफाई का ध्यान रखें।
-दवाओं का छिड़काव जरूर करें।
-बीमार पशुओं के नजदीक न जाएं।