श्रम विभाग की ओर से चलाई जा रहीं योजनाओं से मनरेगा
में काम करने वाले श्रमिक वंचित हो रहे हैं। बीडीओ, ग्राम प्रधान, रोजगार
सेवक और ग्राम सचिवों की लापरवाही प्रदेश सरकार की ओर से संचालित योजनाओं
का लाभ आपात स्थिति में पीड़ित मरीजों तक पहुंचने के रास्ते में अब दीवार
बनने लगी है।
यह खुलासा खुद सरकारी आंकड़े ही कर रहे हैं। गरीबों के हक
और हितों के लिए चुनावी मीटिंगों और कई कार्यक्रमों में संघर्ष करने का राग
अलापने वालों की इस मुद्दे पर बोलती बंद है। कुछ करना तो दूर श्रमिकों के
हित में आवाज उठाने तक की जरूरत जनप्रतिनिधि नहीं महसूस कर रहे हैं।
प्रदेश
शासन ने वित्तीय वर्ष 2015-16 में कन्नौज जनपद के आठ विकास खंडों में
5,054 मजदूरों का पंजीकरण श्रम प्रवर्तन विभाग में कराने का लक्ष्य
निर्धारित किया गया था, ताकि इन मजदूरों को उत्तर प्रदेश भवन एवं अन्य
सन्निर्माण कर्मकार बोर्ड (श्रम विभाग) की ओर से श्रमिकों के हितार्थ चलाई
जा रही योजनाओं का लाभ मिल सके।
विभाग की करीब 15 योजनाओं का लाभ श्रमिकों
को तभी मिलता है, जब उनका पंजीकरण श्रम विभाग में हुआ हो। श्रमिकों के
पंजीकरण को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे अन्य कार्यक्रमों की मनरेगा के
जरिए की गई पहल भी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है।
यही वजह है कि वित्तीय वर्ष
के 10 महीने बीत चुके हैं, लेकिन लक्ष्य के सापेक्ष मात्र 1,809 मजदूरों
का ही पंजीकरण हो सका है। यह लक्ष्य के सापेक्ष 50 फीसदी भी नहीं है। अभी
भी 3,245 मजदूरों को पंजीकरण के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। लापरवाही का
आलम यही रहा तो मार्च अंत तक पंजीकरण लक्ष्य पूरा होने के आसार नहीं हैं।
विकास खंड उमर्दा में 1292, हसेरन में 393, गुगरापुर में 75, छिबरामऊ में
370, तालग्राम में 333, जलालाबाद में 306, सौरिख में 171 और कन्नौज विकास
खंड में 305 श्रमिक अभी भी पंजीकरण से वंचित हैं। इस बाबत सूत्रों की
मानें तो रोजगार सेवक, प्रधानों व ग्राम सचिवों को निर्देश दिए गए थे कि वे
ऐसे मजदूरों को चिह्नित करें जो 50 दिन का काम पूरा कर चुके हैं।
उनसे
श्रम विभाग से मिला आवेदन फार्म जमा कराकर कागजी औपचारिकताएं पूर्ण कर उनका
रजिस्ट्रेशन कराएं, पर ब्लाक का स्टाफ लक्ष्य पूर्ति के लिए रुचि लेने की
बजाय कागजी कोरम पूरा कर रहा है। श्रमिकों को सरकारी योजनाओं की जानकारी तक
देने में कंजूसी बरती जा रही है, जिससे जब गरीब परिवार पर किसी हादसे या
अन्य कारण से संकट के बादल मंडराते हैं तो पंजीकरण न होने के कारण सरकारी
योजनाएं उनके लिए बेमतलब साबित हो जाती हैं।