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Kannauj News: कच्चे कद्दू खाकर मिटाई थी भूख, रास्ता भटकने से कई सैनिक हुए थे बलिदान

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छिबरामऊ। साल 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध का हिस्सा रहे विकास खंड के हाथिन गांव निवासी पूर्व सैनिक दीवान सिंह ने बताया कि युद्ध को याद कर आज भी सिहर उठते हैं। युद्ध के लिए उनकी ग्रेनेडियर बटालियन को ढाका भेजा गया था। रास्ते की सटीक जानकारी न होने के कारण उस युद्ध में हमारे कई सैनिकों ने वीरगति पाई थी। भूख लगने पर कच्चे कद्दू खाकर रात काटी थी।
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उन्हाेंने बताया कि रास्ता की जानकारी के लिए बांग्लादेश की मुक्त महिनी सेना हाथों में लाठी और डंडे लेकर चलती थी। उनके पीछे शस्त्रों से लैस उनकी टुकड़ी चलती थी। ढाका में हालात बिगड़ने पर तीनों सेनाओं के जनरल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की थी। उन्होंने तीनों सेनाओं को अपने स्तर से पाकिस्तानी सैनिकों से निपटने का आदेश दे दिया था। उसके बाद सैनिकों का हौसला और बढ़ गया। युद्ध की रणनीति तैयार कर मैदान में कूद पड़े। पैदल टुकड़ियों को आगे बढ़ने में मदद के लिए उसके पीछे मोटर प्लाटून कवर फायर देती थी। उसी दौरान रूसी समुद्री बेड़ा भारतीय सेना की मदद के लिए पहुंच गया। पश्चिमी पाकिस्तानी से पाक सेना ढाका तक नहीं पहुंच पाई, जिससे भारतीय सेना ने जल्द ही स्थिति को नियंत्रण कर लिया था। युद्ध के दौरान कई समस्याओं से जूझना पड़ा। पाकिस्तानी सेना किसी भी समय आक्रमण कर देती थी, इसके लिए हम सभी को रात भर जागना पड़ता था। कई बार पाकिस्तानी सेना ने उनकी घेराबंदी के प्रयास किए, लेकिन सतर्कता के कारण पाकिस्तानी सैनिक अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए। खाद्य एवं रसद की समय से आपूर्ति न मिल पाने के कारण भूखे भी रहना पड़ा, इस दौरान भूख को नियंत्रित करने के लिए सैनिकों ने कच्चा कद्दू खाकर काम चलाया। 16 दिसंबर को भारतीय सेना ने पूरी तरह से स्थिति को नियंत्रित कर लिया था। संवाद
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