तालग्राम। होली पर गमी वाले घरों में पहुंचकर लोकगीत गाकर खुशियां बांटने की परंपरा सदियों पुरानी है। ऐसा करने से समाज को नई दिशा मिल रही है। होली के दिन गमी वाले घरों में शोक खत्म करने बुजुर्ग और युवाओं की टोली गांव में आज भी पहुंच रही है।
एक ओर प्रकृति की ओर से पुष्प मंजरी, टेसू के फूल, वसंत की अंगड़ाई तथा पछुआ हवा की सरसराहट फागुन आने का स्पष्ट संकेत देती है। वहीं आधुनिकता की दौड़ में होली पर फाग के राग की परंपरा दम तोड़ती नजर आ रही है लेकिन कुछ परंपराएं अभी भी गांवों में जीवित है। होली के दिन गांव में बुजुर्ग, युवाओं के साथ हारमोनियम, ढोलक, झांझ, घुंघरू और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र के साथ गमी वाले घर में जाकर लोकगीतों के माध्यम से दुख भूलकर खुशी मनाने का संदेश देते हैं।
माना जाता है कि गायन के बाद संबंधित घरों की गमी दूर हो जाती है। क्षेत्र के मवैइया, अमोलर, ताहपुर, गदोरा, नेपालपुर समेत सैकड़ों गांवों में होली के दिन सुबह से लोग गमी वाले घरों में पहुंचने लगते हैं। यह सिलसिला देर रात तक चलता रहता है।
निकवा गांव निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक सुरेश सरल बताते हैं कि आधुनिकता की दौड़ के चलते लोक विधाएं और परंपराएं विलुप्त हो रही हैं। त्योहारों की रौनक भी दिनोंदिन कम होती जा रही है लेकिन गमी वाले घरों में पहुंचकर लोकगीत गायन की प्रथा अभी प्रचलित है। इससे भाईचारा बढ़ता है।
नेपालपुर गांव निवासी रामप्रकाश मिश्रा बताते हैं कि समय के साथ सब कुछ बदलने लगा है। रिश्ते औपचारिक होते गए और होली की पुरानी परंपरा बदलने लगी। पहले लोग गांव की चौपाल में देर रात्रि तक फाग गीत गाते थे। अब रस्म अदायगी के तौर पर गमी वाले घरों में लोकगीत सुनने को मिलते हैं।
फोटो:02: सेवानिवृत्त शिक्षक सुरेश सरल। संवाद