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ुलायम का ऐसा जलवा, कि अखिलेश की कन्नौज से कराई थी राजनीति में इंट्री

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कन्नौज। सपा संरक्षक का जिले से गहरा नाता रहा है। भले ही वह आज इस दुनिया में न हो, लेकिन इत्र नगरी में उनकी यादें हमेशा महकती रहेंगी। उनके संघर्ष से लेकर ताजपोशी तक का गवाह रहा है कन्नौज।
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एक वक्त था, मंच से वह जिस प्रत्याशी को जिताने की अपील कर देतेे, उसकी विजय श्री निश्चित होती थी। उनका ऐसा जलवा था कि 1982 से लेकर 2019 तक उतार-चढ़ाव के बीच कन्नौज संसदीय सीट समाजवादियों का गढ़ रही।
राजनीतिक गुरु डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की कर्मभूमि वाली इस सीट से मुलायम सिंह ने खुद रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज की थी।
पार्टी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ही मुलायम ने बेटे अखिलेश यादव की इसी सीट से राजनीति में इंट्री कराई थी।
बहू डिंपल को भी इसी सीट से दिल्ली पहुंचाया। कन्नौज की जनता से उनका हमेशा गहरा नाता रहा। भावुक शब्दों में कई बार उन्होंने मंच से बेटे की तरह यहां के लोगों का जिक्र कर जनता के दिल में अपनी जगह बनाई।
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हर्षवर्धन और राजा जयचंद की नगरी कभी उत्तर भारत की राजधानी रही है। आजादी के बाद हुए 1952 के पहले चुनाव में कन्नौज लोकसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार शंभूनाथ मिश्रा पहले एमपी बने थे।
समाजवादी विचारधारा के जनक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 1967 में कांग्रेसी सांसद शंभूनाथ को हराया। इसके बाद फिर से कांग्रेस का जनाधार बढ़ना शुरू हुआ तो डॉ. राम मनोहर लोहिय की साख बचाने के लिए मुलायम सिंह यादव ने 1980 में छोटे सिंह यादव को दलित मजदूर किसान पार्टी से मैदान में उतारा।
1984 में शीला दीक्षित ने कांग्रेस की वापसी कराकर जीत हासिल की, लेकिन 1989 में छोटे सिंह यादव ने मुलायम सिंह के संरक्षण में चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। 1991 में छोटे सिंह यादव दोबारा जीते। 1996 में भाजपा के चंद्रभूषण सिंह ने पहली बार कमल खिलाकर जीत दर्ज की।
धीरे-धीरे बिखरते जनाधार को जोड़ने की चिंता लिए मुलायम सिंह ने इस बार बड़ा फैसला लिया। करीबी युवा नेता प्रदीप यादव को साइकिल पर सवार कर 1998 के चुनाव मैदान में उतारा। प्रदीप यादव ने कन्नौज संसदीय सीट से ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
यहीं से इस सीट पर मुलायम युग का उदय हुआ। सीट पर समाजवादियों का कब्जा बरकरार रखने के लिए 1999 में मुलायम सिंह यादव ने खुद चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। इसके बाद मुलायम सिंह ने अचानक सीट से इस्तीफा देकर बेटे अखिलेश यादव की राजनीति में इंट्री कराई।
2000 के उप चुनाव में बेटे अखिलेश यादव को चुनाव में जिताकर विरोधियों को चित कर दिया था। इसके बाद 2004, 2009 में लगातार जीत कर उन्होंने हैट्रिक पूरी की। 2012 के उप चुनाव में अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव निर्विरोध चुनकर लोकसभा पहुंची। 2019 में डिंपल को भाजपा के सुब्रत पाठक ने हराया था।
सपा संरक्षक मुलायम सिंह ने 1999 में कन्नौज और संभल से जीत दर्ज की थी। इस्तीफा देने की चर्चाओं के बीच शहर के बोर्डिंग मैदान में मुलायम सिंह की जनसभा हुई।
इसमें वह बेटे अखिलेश यादव और अमर सिंह के साथ पहुंचे थे। भाषण के अंत में उन्होंने अखिलेश यादव का हाथ पकड़कर उठाया और कहा कि बेटे को छोड़कर जा रहा हूं, नेता बनाकर दिल्ली भेज देना।
तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर मुलायम सिंह ने जिले में जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज की सौगात दी थी। सपा सरकार में शुरू हुआ मेडिकल कॉलेज, 2007 की बसपा सरकार में बनकर तैयार हो गया था।
बसपा सरकार ने कन्नौज मेडिकल कॉलेज की जगह नाम डॉ. भीमराव आंबेडकर राजकीय मेडिकल कॉलेज कर दिया था।
इस पर नेता जी आहत हुए थे। बाद में सपा सरकार बनने पर अखिलेश यादव ने मेडिकल कॉलेज का नाम राजकीय मेडिकल कॉलेज तिर्वा-कन्नौज किया था।
मुलायम सिंह यादव जिले के सबसे लोकप्रिय नेता रहे। उनकी लोकप्रियता से सपा का कुनबा खूूब फला-फूला। शहर में तिर्वा रोड नसरापुर के पास मुलायम सिंह के समर्थकों ने उनके नाम से मुलायम नगर बसा दिया।
मुलायम नगर निवासी सपा नेता संतोष यादव ने बताया कि 2004 में मुलायम सिंह यादव की रैली में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने भाग लिया था।
रैली से लौटने के बाद नई बस्ती का नाम मुलायम नगर रखा गया था।
वर्ष 1997 से पूर्व कन्नौज फर्रुखाबाद में शामिल था। इसलिए ज्यादा से ज्याद बड़े नेताओं की रैलियां फर्रुखाबाद में होती थी।
वर्ष 1982 में पहली बार मुलायम सिंह यादव ने लोकदल से नेता प्रतिपक्ष के रुप में गौरी शंकर रोड फर्श मोहल्ला में पकड़िया के नीचे जनसभा की थी।
इसके बाद जेल भरो आंदोलन में भाग लेने वाले नेताओं को 1987 में एसबीएस इंटर कॉलेज मैदान में प्रमाण पत्र वितरित करने आए थे। फिर उनके जनपद में आने का सिलसिला बना रहा।
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