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मुफलिसी में जी रहा है शहीद का परिवार

Tue, 15 Dec 2015 11:59 PM IST
ब्यूूराे/अमर उजाला, कन्नौज
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देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद कृष्ण मुरारी दुबे का परिवार मुफलिसी में जी रहा है। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त करने वाले जनपद के एक मात्र सैनिक ग्राम सराय भागमल निवासी कृष्ण मुरारी दुबे के परिजनों को कोई पूछने वाला नहीं है।
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सरकारी इमदाद तो दूर उनके हालचाल लेने की भी किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को फुर्सत नहीं है। हालत यह हैं शासन-प्रशासन के लोगों को यह तक पता नहीं कि उनके जनपद का भी कोई सैनिक देश की रक्षा के लिए शहीद हो गया था। सौरिख क्षेत्र के ग्राम सराय भागमल निवासी कृष्णमुरारी दुबे पांच भाई थे।

वह थल सेना में लखनऊ यूनिट से वर्ष 1964 में भर्ती हुए थे। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान 24 नवंबर 71 को वह शहीद हो गए थे। उनके भाई शिवनरेश दुबे ने बताया कि ढाका के छम्मू क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना से जंग के दौरान वह वीरगति को प्राप्त हो गए थे। कुछ दिनों बाद घर में आए तार से उनके शहीद होने की जानकारी मिली थी।
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वर्तमान में उनकी पत्नी हसमुखी देवी मोहल्ला समतानगर (कैलाश पर्वत) के पास अपनी बड़ी पुत्री मंजुला देवी के साथ रह रही हैं। पति की शहादत की व्यथा बताते हुए कहा कि उनकी शादी के चार वर्ष हुए थे। उनके दो पुत्रियां मंजुला उस समय डेढ़ वर्ष की और छोटी पुत्री संतोष सिर्फ छह दिन की थी।

तभी वह भारत-पाक युद्ध में शहीद हो गए थे। छोटी पुत्री की जिस दिन घर में छठी मनाई जा रही थी, उसी समय डाकिया ने घर पहुंचकर तार दिया था। जिसमें उनके पति की शहादत की बात कही गई थी। करीब डेढ़ माह बाद उनके कपड़ों की किट गांव पहुंची थी।

अपने पति के शहीद होने की जानकारी होते ही उनके हाथ से पुत्री दूर जा गिरी और वह स्वयं बेहोश हो गईं। उन्होंने बताया कि जिस देश की रक्षा के लिए उनके पति ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, आज उस देश का कोई भी अधिकारी या नेता उनका पुरसाहाल जानने नहीं आया।

16 दिसंबर को बलिदान दिवस मनाने की जानकारी भी उन्हें उनके घर पहुंची अमर उजाला की टीम द्वारा ही हुई। बताया कि पति की मौत के बाद अपने दो छोटे बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी। उन्हें 147 रुपये प्रति माह पेंशन मिलती थी। जिससे पूरे घर का गुजारा करती थी।

काफी प्रयासों के बाद भी उन्हें न तो सेना से और न ही सरकार से कोई सुविधा मिली। बड़ी बेटी मंजुला की 1991 में उन्होंने शादी की। उस समय पेंशन बढ़कर 500 रुपये हो गई थी। 1997 में उन्होंने अपनी छोटी बेटी संतोष की शादी कर दी। दोनों बेटियों की शादी में भी उन्हें कोई मदद नहीं मिली।

उन्होंने कहा कि आज कोई भी सैनिक शहीद होता है, तो उसे लाखों रुपये की नगदी के साथ तमाम तरह की सुविधाएं और सम्मान प्रदान किए जाते हैं, पर भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद होने के बाद उन्हें अभी तक किसी भी तरह की कोई मदद नहीं दी गई। सम्मान के नाम पर पति के शहीद होने के बाद दो बार जम्मू में और एक बार नागपुर स्थित कामठी सेंटर में बुलाकर उन्हें सम्मानित किया गया था।
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